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श्री शिव चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ

"जय गणेश गिरिजा सुवन" से शुरू होने वाली पूरी शिव चालीसा: दोहा, सभी चौपाइयाँ, अंतिम दोहे, हर हिस्से का सरल अर्थ और पाठ का आसान तरीका।

📖 १० मिनट पढ़ें
इस लेख में
  1. प्रारंभिक दोहा
  2. चौपाई 1 से 10
  3. चौपाई 11 से 20
  4. चौपाई 21 से 30
  5. चौपाई 31 से 40
  6. समापन चौपाई
  7. अंतिम दोहे
  8. पाठ-भेद
  9. कैसे पढ़ें
  10. ध्यान रखने योग्य बातें

शिव चालीसा भगवान शिव की सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली स्तुतियों में से एक है। सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर घर-घर में इसका पाठ होता है। इसमें शिव जी के रूप, उनके परिवार और उनकी दया की कथाएँ सीधी-सादी भाषा में गाई गई हैं।

इसके पहले ही दोहे में रचनाकार अपना नाम बताते हैं: "कहत अयोध्यादास"। अंत में भी "कहैं अयोध्यादास" आता है। इसलिए इसे अयोध्यादास जी की रचना माना जाता है; उनके बारे में और कोई पक्की जानकारी नहीं मिलती।

इसमें शुरू में एक दोहा, फिर 40 चौपाइयाँ, एक समापन चौपाई और अंत में दो दोहे हैं। पूरा पाठ लगभग 8 से 10 मिनट में हो जाता है।

नीचे दिया पाठ कई भरोसेमंद स्रोतों से मिलाकर लिखा गया है। जहाँ पुस्तकों में शब्द अलग मिलते हैं, वे "पाठ-भेद" में दिए गए हैं।

प्रारंभिक दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

अर्थ: हे गिरिजा (पार्वती) के पुत्र गणेश जी, आपकी जय हो। आप सब मंगलों की जड़ हैं और बहुत ज्ञानी हैं। अयोध्यादास कहते हैं: मुझे निडर रहने का वरदान दीजिए।

चौपाई 1 से 10

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥ 1भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥ 2

अर्थ: हे गिरिजा के पति, दीनों पर दया करने वाले शिव जी, आपकी जय हो। आप सदा संतों की रक्षा करते हैं। आपके माथे पर चंद्रमा सुंदर लगता है और कानों में नाग के फन जैसे कुंडल हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥ 3वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥ 4

अर्थ: आपका शरीर गोरा है, सिर की जटाओं से गंगा बहती है, गले में मुंडों की माला है और शरीर पर भस्म लगी है। आप बाघ की खाल पहनते हैं; आपकी इस छवि को देखकर नाग भी मोहित हो जाते हैं।

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥ 5कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥ 6

अर्थ: मैना माता (हिमालय की पत्नी) की लाडली बेटी पार्वती जी आपके बाएँ अंग में विराजती हैं; उनकी छवि सबसे निराली है। आपके हाथ में त्रिशूल की भारी शोभा है, जो सदा शत्रुओं का नाश करता है।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥ 7कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥ 8

अर्थ: आपके पास नंदी और गणेश जी ऐसे शोभा देते हैं, जैसे सागर के बीच कमल खिले हों। कार्तिकेय जी, गणों के स्वामी और पूरे शिव-परिवार की यह छवि ऐसी है कि कोई उसका वर्णन नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥ 9किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥ 10

अर्थ: देवता जब-जब आपको पुकारने गए, आपने तभी उनका दुख दूर कर दिया। जब तारकासुर ने भारी उत्पात मचाया, तो सब देवताओं ने मिलकर आपसे प्रार्थना की।

चौपाई 11 से 20

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥ 11आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥ 12

अर्थ: आपने तुरंत षडानन (छह मुख वाले कार्तिकेय) को भेजा, जिन्होंने पलक झपकते ही तारकासुर को मार गिराया। आपने स्वयं जलंधर असुर का अंत किया; आपका यश पूरे संसार में जाना जाता है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥ 13किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥ 14

अर्थ: त्रिपुरासुर से युद्ध करके आपने कृपा कर सबको बचा लिया। राजा भगीरथ ने भारी तप किया, तो हे त्रिपुर के शत्रु (पुरारी), आपने उनकी प्रतिज्ञा पूरी की। गंगा जी को अपनी जटाओं में थामकर धरती पर उतरने दिया।

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥ 15वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥ 16

अर्थ: दान देने वालों में आपके जैसा कोई नहीं; आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं। वेदों ने आपके नाम की महिमा गाई है, फिर भी आप शब्दों से परे और अनादि हैं; आपका पूरा रहस्य कोई नहीं जान पाया।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥ 17कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥ 18

अर्थ: समुद्र मंथन में विष की ज्वाला निकली, जिसकी जलन से देवता और असुर दोनों बेहाल हो गए। तब आपने दया करके उनकी सहायता की और वह विष अपने कंठ में रोक लिया; तभी से आप नीलकंठ कहलाए। पूरी कथा: समुद्र मंथन।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥ 19सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥ 20

अर्थ: श्रीराम ने जब आपकी पूजा की, तो उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को सौंप दी। जब श्रीराम हज़ार कमलों से आपकी पूजा कर रहे थे, तब आपने उनकी परीक्षा ली।

चौपाई 21 से 30

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥ 21कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥ 22

अर्थ: आपने उन हज़ार कमलों में से एक कमल छिपा लिया। तब कमल जैसी आँखों वाले श्रीराम ने उस एक कमल की जगह अपनी आँख ही चढ़ाना चाहा। ऐसी कठिन भक्ति देखकर शंकर जी प्रसन्न हुए और उन्हें मनचाहा वर दिया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥ 23दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥ 24

अर्थ: हे अनंत, कभी नष्ट न होने वाले शिव, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप हर प्राणी के हृदय में बसकर सब पर कृपा करते हैं। (अब भक्त अपनी बात कहता है:) बुरे लोग और बुरी बातें मुझे रोज़ सताती हैं; मैं भटकता रहता हूँ और मन को चैन नहीं मिलता।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥ 25लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥ 26

अर्थ: हे नाथ, मैं "बचाओ, बचाओ" पुकार रहा हूँ; इस घड़ी आकर मुझे उबार लीजिए। त्रिशूल उठाकर मेरे शत्रुओं को मिटाइए और मुझे संकट से निकालिए। (भक्त के लिए ये शत्रु भीतर के भी हैं: डर, क्रोध और लालच।)

मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥ 27स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥ 28

अर्थ: माता-पिता, भाई, सब होते हैं, पर संकट में कोई साथ नहीं पूछता। हे स्वामी, मुझे बस आपकी ही आशा है; आकर मेरा भारी संकट दूर कीजिए।

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥ 29अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥ 30

अर्थ: आप निर्धन को सदा धन देते हैं; जो भी आपसे माँगता है, उसे फल मिलता है। मैं आपकी स्तुति किस तरह करूँ? हे नाथ, हमारी भूलें क्षमा कीजिए।

चौपाई 31 से 40

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥ 31योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥ 32नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥ 33

अर्थ: हे शंकर, आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल करने वाले और विघ्न मिटाने वाले हैं। योगी, संन्यासी और मुनि आपका ध्यान करते हैं; सरस्वती जी और नारद जी आपको सिर झुकाते हैं। "नमो नमो जय नमः शिवाय": देवता और ब्रह्मा जी भी आपकी महिमा का पार नहीं पाते। इसी मंत्र के बारे में पढ़ें: ॐ नमः शिवाय।

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥ 34ऋनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥ 35पुत्र हीन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥ 36

अर्थ: जो मन लगाकर यह पाठ करता है, शम्भु उसके सहायक बनते हैं। चालीसा कहती है कि कर्ज़ से दबा व्यक्ति भी पाठ करे तो उससे उबरता है, और जो संतान की इच्छा रखता है, उस पर भी शिव जी की कृपा होती है। ये भक्तों के विश्वास की बातें हैं।

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥ 37त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥ 38

अर्थ: त्रयोदशी के दिन पंडित जी को बुलाकर ध्यान से हवन कराए। जो हमेशा त्रयोदशी (प्रदोष) का व्रत रखता है, उसके शरीर में कष्ट नहीं टिकता, ऐसा भक्तों का भरोसा है।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥ 39जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥ 40

अर्थ: धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) चढ़ाकर शंकर जी के सामने यह पाठ सुनाए। इससे जन्म-जन्म के पाप मिटते हैं और अंत में शिवलोक मिलता है।

समापन चौपाई

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

अर्थ: अयोध्यादास कहते हैं: हे प्रभु, मुझे आपकी ही आशा है। आप सब कुछ जानते हैं; हमारे सारे दुख हर लीजिए।

अंतिम दोहे

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

अर्थ: मैं रोज़ नियम से सुबह यह चालीसा पढ़ता हूँ; हे जगत के स्वामी, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए। मार्गशीर्ष (अगहन) महीने की षष्ठी को, हेमंत ऋतु में, "संवत चौसठ" में शिव जी की यह चालीसा-स्तुति सबके कल्याण के लिए पूरी हुई। (दोहे में केवल "चौसठ" लिखा है, कौन-सी सदी का संवत है, यह नहीं बताया गया।)

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों और वेबसाइटों में कुछ पंक्तियों के शब्द थोड़े अलग मिलते हैं। ऊपर वही पाठ है जो सबसे ज़्यादा प्रचलित है; दूसरे रूप भी भक्तों में गाए जाते हैं:

  • चौपाई 13: "सबहिं कृपा कर लीन बचाई"; कुछ पुस्तकों में "तबहिं कृपा कर लीन बचाई"।
  • चौपाई 16: "वेद नाम महिमा तव गाई"; कुछ में "वेद माहि महिमा तुम गाई" (वेदों में आपकी महिमा गाई गई)।
  • चौपाई 20: "कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी"; कुछ में "तबहिं त्रिपुरारी"। दोनों शिव जी के ही नाम हैं।
  • चौपाई 27: "मात-पिता भ्राता सब होई"; कुछ में "सब कोई"।
  • चौपाई 36: "पुत्र हीन कर इच्छा जोई"; कुछ में "पुत्र होन कर/की इच्छा जोई" (पुत्र होने की इच्छा)।
  • चौपाई 38: "ताके तन नहीं रहै कलेशा"; कुछ में "तन नहिं ताके रहै कलेशा"। अर्थ एक ही है।
  • पहला दोहा कुछ जगह "श्री गणेश गिरिजा सुवन" से शुरू होता है।
  • अंतिम दोहे: एक प्रकाशन में पहला दोहा "नित नेम उठि प्रातः ही पाठ करो चालीस" के रूप में है और "मगसर छठि हेमन्त ऋतु" वाला दूसरा दोहा नहीं है। ज़्यादातर पुस्तकों में दोनों दोहे मिलते हैं।

कैसे पढ़ें

  • सोमवार, प्रदोष (त्रयोदशी), सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर शिव चालीसा का पाठ विशेष रूप से किया जाता है। पर किसी भी दिन, सुबह या शाम, पढ़ा जा सकता है।
  • स्नान के बाद शांत जगह बैठें। शिवलिंग या शिव जी का चित्र हो तो जल, बेलपत्र या एक फूल चढ़ाएँ, दीपक जलाएँ। कुछ न हो तो भी मन से याद करना काफ़ी है।
  • शुरू करने से पहले तीन बार "ॐ नमः शिवाय" बोलें, फिर धीरे-धीरे, अर्थ समझते हुए पाठ करें।
  • पाठ के बाद शिव जी की आरती गाई जा सकती है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • चालीसा में जिन फलों की बात है (कर्ज़, संतान, रोग से मुक्ति), वे भक्तों की आस्था हैं, किसी चीज़ की गारंटी नहीं। पाठ मन को शांत और मज़बूत करता है; मुश्किल में मेहनत, डॉक्टर और सही सलाह के साथ प्रार्थना करें।
  • शब्द गलत हो जाएँ तो डरने की बात नहीं। भोलेनाथ भाव देखते हैं; धीरे-धीरे उच्चारण अपने आप सुधर जाता है।

आगे पढ़ें: भगवान शिव — परिचय, स्वरूप का अर्थ, 12 ज्योतिर्लिंग और प्रसिद्ध मंदिर, ॐ जय शिव ओंकारा — शिव जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ), ॐ नमः शिवाय — पंचाक्षर मंत्र का अर्थ, स्रोत और जप विधि, महामृत्युंजय मंत्र — शब्दार्थ, भावार्थ और जप विधि, समुद्र मंथन की कथा — चौदह रत्न, माँ लक्ष्मी और नीलकंठ महादेव

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