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श्री दुर्गा चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ

"नमो नमो दुर्गे सुख करनी" वाली पूरी दुर्गा चालीसा: सभी चौपाइयाँ, हर हिस्से का सरल अर्थ, पाठ-भेद और नवरात्रि या रोज़ पाठ का आसान तरीका।

📖 १० मिनट पढ़ें
इस लेख में
  1. चौपाई 1 से 9: माँ का रूप
  2. चौपाई 10 से 20: माँ के अनेक रूप
  3. चौपाई 21 से 30: असुरों का संहार और भक्तों की रक्षा
  4. चौपाई 31 से 40: शंकराचार्य की कथा और भक्त की विनती
  5. समापन चौपाई
  6. कुछ पुस्तकों में अंत का दोहा
  7. पाठ-भेद
  8. कैसे पढ़ें
  9. ध्यान रखने योग्य बातें

श्री दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की सबसे प्रसिद्ध स्तुति है। नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी, माता की चौकी और जगराते में यह लगभग हर जगह गाई जाती है, और बहुत से घरों में रोज़ या हर शुक्रवार इसका पाठ होता है।

इसमें माँ के अनेक रूप एक साथ आते हैं: अन्नपूर्णा, गौरी, सरस्वती, लक्ष्मी, दस महाविद्याएँ, और महिषासुर व शुंभ-निशुंभ का संहार करने वाली कालिका। अंतिम चौपाई में रचनाकार का नाम आता है: "देवीदास शरण निज जानी", इसलिए इसे देवीदास जी की रचना माना जाता है।

इस चालीसा की शुरुआत में कोई दोहा नहीं है; यह सीधे "नमो नमो दुर्गे सुख करनी" से शुरू होती है। इसमें 40 चौपाइयाँ और एक समापन चौपाई है। पाठ में लगभग 7 से 9 मिनट लगते हैं।

नीचे दिया पाठ कई भरोसेमंद स्रोतों से मिलाकर लिखा गया है। जहाँ पुस्तकों में शब्द अलग मिलते हैं, वे "पाठ-भेद" में दिए गए हैं।

चौपाई 1 से 9: माँ का रूप

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥ 1निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥ 2

अर्थ: हे सुख देने वाली दुर्गा माँ, आपको बार-बार नमस्कार। हे दुख हरने वाली अम्बे माँ, आपको बार-बार नमस्कार। आपकी ज्योति का कोई आकार नहीं, और उसका उजाला तीनों लोकों में फैला है।

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥ 3रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥ 4

अर्थ: आपके माथे पर चंद्रमा है, मुख बड़ा तेजस्वी है, आँखें लाल हैं और भौंहें (दुष्टों के लिए) भयंकर हैं। फिर भी माँ का यह रूप बहुत सुहाना लगता है; दर्शन करके भक्तों को बड़ा सुख मिलता है।

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥ 5अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥ 6प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥ 7

अर्थ: आपने अपनी शक्ति से यह संसार रचा और उसके पालन के लिए अन्न और धन दिया। अन्नपूर्णा बनकर आप जगत को पालती हैं, और आप ही आदि सुंदरी बाला हैं। प्रलय के समय सबका अंत करने वाली भी आप हैं, और आप ही शिव जी की प्यारी गौरी हैं।

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥ 8रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥ 9

अर्थ: योगी शिव आपके गुण गाते हैं; ब्रह्मा और विष्णु रोज़ आपका ध्यान करते हैं। आपने सरस्वती का रूप धरकर ऋषि-मुनियों को अच्छी बुद्धि दी और उनका उद्धार किया।

चौपाई 10 से 20: माँ के अनेक रूप

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥ 10रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥ 11

अर्थ: हे अम्बा, आपने नरसिंह का रूप धारण किया और खंभा फाड़कर प्रकट हुईं। आपने प्रह्लाद की रक्षा करके उसे बचाया और उसके अत्याचारी पिता को स्वर्ग भेज दिया। (पुराणों में प्रह्लाद के पिता का नाम हिरण्यकशिपु है; प्रचलित पाठ में यहाँ "हिरण्याक्ष" लिखा मिलता है, जो उसका भाई था।) कथा पढ़ें: भक्त प्रह्लाद।

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥ 12क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥ 13हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥ 14

अर्थ: आपने संसार में लक्ष्मी का रूप धरा और श्री नारायण के अंग में समा गईं। आप क्षीरसागर में विहार करती हैं; हे दया की सागर, मेरे मन की आशा पूरी कीजिए। हिंगलाज में भी आप ही भवानी रूप में हैं; आपकी अपार महिमा का बखान नहीं हो सकता।

मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥ 15श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥ 16

अर्थ: मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी और बगलामुखी, सुख देने वाली माताएँ; भैरवी, संसार को पार लगाने वाली तारा, और संसार के दुख मिटाने वाली छिन्नमस्ता, ये सब (दस महाविद्याएँ) आपके ही रूप हैं।

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥ 17कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥ 18सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥ 19

अर्थ: हे भवानी, आप सिंह की सवारी पर शोभा देती हैं और आपके आगे-आगे वीर लांगुर चलते हैं (बहुत से भक्त इन्हें हनुमान जी मानते हैं)। आपके हाथों में खप्पर और तलवार है, जिन्हें देखकर काल भी डरकर भाग जाता है। आपके अस्त्र और त्रिशूल ऐसे हैं कि शत्रुओं के हृदय में पीड़ा उठने लगती है।

नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥ 20

अर्थ: नगरकोट (कांगड़ा) में भी आप ही विराजती हैं, और तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।

चौपाई 21 से 30: असुरों का संहार और भक्तों की रक्षा

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥ 21महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥ 22रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥ 23

अर्थ: आपने शुंभ और निशुंभ दानवों को मारा और रक्तबीज जैसे असुरों का संहार किया। महिषासुर नाम का राजा बहुत घमंडी था; उसके पापों के बोझ से धरती व्याकुल हो गई थी। तब आपने कालिका का भयंकर रूप धरकर उसे उसकी सेना सहित मार दिया।

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥ 24अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥ 25ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥ 26

अर्थ: जब-जब संतों पर भारी संकट आया, तब-तब माँ, आपने उनकी सहायता की। देवताओं की नगरी और इंद्र का लोक, सब आपकी महिमा से ही शोक-रहित रहते हैं। ज्वाला जी में आपकी ही ज्योति जलती है, और नर-नारी सदा आपकी पूजा करते हैं।

प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥ 27ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥ 28

अर्थ: जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाता है, दुख और दरिद्रता उसके पास नहीं आते, ऐसा भक्तों का विश्वास है। जो मन लगाकर आपका ध्यान करता है, वह जन्म और मृत्यु के चक्र से छूट जाता है।

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥ 29शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥ 30

अर्थ: योगी, देवता और मुनि पुकारकर कहते हैं कि आपकी शक्ति के बिना योग सिद्ध नहीं होता। (इसकी एक कथा:) शंकराचार्य जी ने बड़ा तप किया और काम व क्रोध, सबको जीत लिया।

चौपाई 31 से 40: शंकराचार्य की कथा और भक्त की विनती

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥ 31शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥ 32शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥ 33भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥ 34

अर्थ: वे दिन-रात शंकर (शिव) का ध्यान करते रहे, पर कभी आपको याद नहीं किया। वे शक्ति के रूप का रहस्य नहीं समझ पाए; जब उनकी शक्ति चली गई, तब मन में पछताए। फिर उन्होंने आपकी शरण लेकर आपकी कीर्ति गाई: "जय जय जय जगदम्ब भवानी!" आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं और बिना देर किए उन्हें फिर से शक्ति दे दी। (यह कथा चालीसा में इसी रूप में आती है।)

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥ 35आशा तृष्णा निपट सतावें। रिपु मूरख मोही डरपावे॥ 36शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥ 37

अर्थ: माँ, मुझे भारी कष्टों ने घेर रखा है; आपके बिना मेरा दुख कौन हरेगा? आशा और तृष्णा (लालच) मुझे बहुत सताती हैं, और शत्रु व नासमझ लोग मुझे डराते हैं। हे महारानी, मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए; हे भवानी, मैं एक मन से आपको याद करता हूँ।

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥ 38जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥ 39श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥ 40

अर्थ: हे दयालु माँ, कृपा कीजिए और ऋद्धि-सिद्धि देकर मुझे निहाल कर दीजिए। जब तक जीऊँ, आपकी दया का फल पाता रहूँ और सदा आपका यश सुनाता रहूँ। जो कोई यह दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर अंत में परमपद पाता है।

समापन चौपाई

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

अर्थ: हे जगदम्बा भवानी, देवीदास को अपनी शरण में आया जानकर उस पर कृपा कीजिए।

कुछ पुस्तकों में अंत का दोहा

कई प्रकाशनों में चालीसा के बाद यह दोहा भी गाया जाता है; कई में यह नहीं होता:

शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निःशंक।मैं आया तेरी शरण में, मातु लीजिये अंक॥

अर्थ: माँ, आप शरण में आए की रक्षा करती हैं, इसलिए आपका भक्त निडर रहता है। मैं आपकी शरण में आया हूँ; माँ, मुझे अपनी गोद में ले लीजिए।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों और वेबसाइटों में कुछ पंक्तियाँ थोड़ी अलग मिलती हैं। ऊपर सबसे प्रचलित पाठ है; ये रूप भी गाए जाते हैं:

  • चौपाई 1: "नमो नमो अम्बे दुःख हरनी"; बहुत सी पुस्तकों में "नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी" (दोनों आधी पंक्तियों में "दुर्गे")।
  • चौपाई 11: "हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो"; एक पुराने पाठ में "हिरणाकुश को…" (यानी हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद के पिता)।
  • चौपाई 15: "मातंगी अरु धूमावति माता"; कुछ में "मातंगी धूमावति माता"।
  • चौपाई 16: "श्री भैरव तारा जग तारिणी"; कुछ में "श्री भैरवी तारा…"।
  • चौपाई 19: "सोहै अस्त्र और त्रिशूला"; कुछ में "तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला"।
  • चौपाई 25: "तब महिमा सब रहें अशोका"; कुछ में "तव महिमा" (आपकी महिमा)।
  • चौपाई 30: "काम अरु क्रोध जीति सब लीनो"; कुछ में "काम क्रोध जीति…"।
  • चौपाई 36 (सबसे बड़ा अंतर): "आशा तृष्णा निपट सतावें। रिपु मूरख मोही डरपावे॥"; कई पुस्तकों में दूसरी आधी पंक्ति "मोह मदादिक सब बिनशावें" है (मोह, घमंड आदि मुझे नष्ट कर रहे हैं)। स्रोतों में दोनों लगभग बराबर मिलते हैं; यहाँ "रिपु मूरख" लिया गया है क्योंकि अगली पंक्ति "शत्रु नाश कीजै महारानी" से यही जुड़ती है।
  • चौपाई 40: "श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै"; कुछ में "श्री" नहीं है, एक में "दुर्गा चालीसा जो जन गावे"।
  • समापन चौपाई: "करहु कृपा जगदम्ब भवानी"; एक जगह "कहु कृपा" छपा है।

कैसे पढ़ें

  • नवरात्रि के नौ दिन, दुर्गा अष्टमी, हर शुक्रवार या मंगलवार, या रोज़ सुबह-शाम, जब मन करे, पढ़ सकते हैं।
  • स्नान के बाद माँ के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक जलाएँ, एक लाल फूल या चुनरी चढ़ा सकते हैं। सामग्री न हो तो हाथ जोड़कर मन से माँ को याद करना ही काफ़ी है।
  • धीरे-धीरे पढ़ें; नवरात्रि में बहुत से परिवार साथ बैठकर गाते हैं। पाठ के बाद दुर्गा जी की आरती "जय अम्बे गौरी" गाई जा सकती है।
  • माँ के नौ रूपों के बारे में पढ़ें: माँ दुर्गा और नवदुर्गा।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • चालीसा में बताए फल भक्तों की आस्था हैं, कोई गारंटी नहीं। माँ का पाठ डर को हटाकर साहस देने के लिए है; इसे डर से नहीं, प्रेम से पढ़ें।
  • माँ के उग्र रूप (कालिका, खप्पर, खड्ग) बुराई के नाश के प्रतीक हैं; भक्त के लिए वे सदा रक्षा करने वाली माँ हैं।

आगे पढ़ें: माँ दुर्गा और नवदुर्गा — नौ रूप, नवरात्रि के नौ दिन, कथा और मंदिर, जय अम्बे गौरी — माँ दुर्गा की आरती (पूरे बोल और अर्थ), भक्त प्रह्लाद की कथा — हिरण्यकशिपु और भगवान नृसिंह, श्री लक्ष्मी चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ, हनुमान चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ

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