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जय अम्बे गौरी — माँ दुर्गा की आरती (पूरे बोल और अर्थ)

माँ दुर्गा की प्रसिद्ध आरती "जय अम्बे गौरी" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ और नवरात्रि में आरती करने का तरीका।

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इस लेख में
  1. आरती के पूरे बोल
  2. सरल अर्थ
  3. आरती कैसे करें
  4. ध्यान रखने योग्य बातें

"जय अम्बे गौरी" माँ दुर्गा की सबसे प्रसिद्ध आरती है। नवरात्रि के नौ दिनों में सुबह-शाम, दुर्गा पूजा के पंडालों में और देवी मंदिरों में यही आरती गूँजती है। बहुत से घरों में शुक्रवार को भी इसे गाया जाता है।

इस आरती में माँ के सुंदर रूप का भी वर्णन है और उनके पराक्रम का भी: शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज और मधु-कैटभ जैसे असुरों का नाश। ये कथाएँ मुख्य रूप से दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण का अंश) में मिलती हैं। अंतिम पद में "शिवानन्द स्वामी" का नाम आता है, जिन्हें इसका रचयिता माना जाता है।

आरती के पूरे बोल

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥जय अम्बे गौरी॥
माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥जय अम्बे गौरी॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥जय अम्बे गौरी॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥जय अम्बे गौरी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥जय अम्बे गौरी॥
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥जय अम्बे गौरी॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥जय अम्बे गौरी॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥जय अम्बे गौरी॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों।बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥जय अम्बे गौरी॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पति करता॥जय अम्बे गौरी॥
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥जय अम्बे गौरी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥जय अम्बे गौरी॥
श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै॥जय अम्बे गौरी॥

कुछ जगह शब्दों में हल्का अंतर मिलता है, जैसे "हरि ब्रह्मा शिवजी", "भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी" या "श्री मालकेतु में राजत"; कई घरों में "चौंसठ योगिनी गावत" (बिना "मंगल") भी गाया जाता है। अपने घर में जैसे गाते आए हैं, वैसे ही गाइए।

सरल अर्थ

पहला पद: हे अम्बे, हे गौरी (उजले रूप वाली) और श्यामा (साँवले रूप वाली) माँ, आपकी जय हो। विष्णु, ब्रह्मा और शिव भी दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।

दूसरा पद: आपकी माँग में सिंदूर और माथे पर कस्तूरी का टीका शोभा देता है। आपकी दोनों आँखें उजली हैं और चेहरा चाँद जैसा सुंदर है।

तीसरा पद: आपका शरीर सोने जैसा चमकता है, आप लाल वस्त्र पहने हैं और गले में लाल फूलों की माला सजी है।

चौथा पद: आप सिंह पर सवार हैं और हाथों में तलवार और खप्पर धारण करती हैं। देवता, मनुष्य और मुनि आपकी सेवा करते हैं, और आप उन सबका दुख दूर करती हैं। सिंह साहस का प्रतीक है और तलवार बुराई को काटने वाले विवेक का।

पाँचवाँ पद: कानों में कुंडल और नाक में मोती है। आपका तेज करोड़ों चंद्रमाओं और सूर्यों जैसा जगमगाता है।

छठा पद: आपने शुम्भ-निशुम्भ को चीर डाला और महिषासुर का वध किया। "धूम्र विलोचन" को आम तौर पर उस असुर धूम्रलोचन से जोड़ा जाता है जिसे माँ ने भस्म किया; कुछ लोग इसे माँ की धुएँ जैसी गहरी, शक्ति से भरी आँखों का वर्णन भी मानते हैं।

सातवाँ पद: आपने चण्ड और मुण्ड का संहार किया, और रक्तबीज को समाप्त किया, जिसके खून की हर बूँद से नया असुर पैदा हो जाता था। मधु-कैटभ को भी मारा और देवताओं को निर्भय कर दिया।

आठवाँ पद: आप ही ब्रह्माणी (सरस्वती), रुद्राणी (पार्वती) और कमला (लक्ष्मी) हैं। वेद और शास्त्र आपका गुणगान करते हैं और आप शिव जी की पटरानी हैं।

नौवाँ पद: चौंसठ योगिनियाँ आपके मंगल गीत गाती हैं और भैरव नाचते हैं। ताल, मृदंग और डमरू बज रहे हैं; मानो पूरा ब्रह्मांड माँ का उत्सव मना रहा है।

दसवाँ पद: आप ही संसार की माता हैं और आप ही सबका भरण-पोषण करती हैं। भक्तों का दुख हरती हैं और सुख-समृद्धि देती हैं।

ग्यारहवाँ पद: आपकी चारों भुजाएँ सुंदर हैं और एक हाथ वरदान की मुद्रा में है। जो स्त्री-पुरुष आपकी सेवा करते हैं, उनकी अच्छी कामनाएँ पूरी होती हैं।

बारहवाँ पद: सोने की थाली में अगर (सुगंधित लकड़ी), कपूर और बाती जल रही है। आपके धाम में करोड़ों रत्नों जैसी ज्योति जगमगा रही है।

अंतिम पद: शिवानंद स्वामी कहते हैं: जो भी अम्बे माँ की यह आरती गाता है, उसके जीवन में सुख और समृद्धि आती है।

आरती कैसे करें

नवरात्रि में बहुत से घरों में कलश के पास अखंड दीपक जलाया जाता है और रोज़ सुबह-शाम यह आरती होती है। नौ दिनों के नौ रूपों के बारे में पढ़ें: माँ दुर्गा और नवदुर्गा — नौ रूप, नवरात्रि के नौ दिन, कथा और मंदिर।

  • थाली में घी या तेल का दीपक (एक बत्ती या पाँच बत्ती, जैसा आपके घर में चलन हो), थोड़ा कपूर, फूल, अक्षत और जल रख लें।
  • साफ़ जगह पर बैठें या खड़े हों। बहुत से घरों में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पूजा करने का चलन है; अपने घर की परंपरा मानें।
  • थाली को घड़ी की सुई की दिशा में (दाहिनी ओर से) धीरे-धीरे घुमाएँ। एक प्रचलित तरीका है: चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे विग्रह के सामने सात बार। अलग-अलग परंपराओं में यह संख्या अलग हो सकती है, इसलिए इसे नियम नहीं, सहायक मार्गदर्शन समझें।
  • घंटी, शंख या ताली के साथ पूरा परिवार मिलकर गाए तो आरती का आनंद कई गुना हो जाता है।
  • आरती के बाद थाली सबके सामने ले जाएँ। दोनों हथेलियाँ दीपक की लौ के ऊपर घुमाकर आँखों और सिर से लगाएँ।

दीपक जलाते समय दुपट्टे, पर्दे और बच्चों का ध्यान रखें; आरती का भाव सबसे बड़ा है, दिखावा नहीं।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • माँ दुर्गा की कथाओं का सार है: डर के आगे झुकना नहीं, बुराई के सामने डटकर खड़े होना।
  • आरती के बाद "जय माता दी" या "बोलो साँचे दरबार की जय" का जयकारा लगाने का चलन है।
  • दुर्गा सप्तशती में ये कथाएँ विस्तार से हैं; बच्चों को सरल रूप में सुनाएँ।

आगे पढ़ें: माँ दुर्गा और नवदुर्गा — नौ रूप, नवरात्रि के नौ दिन, कथा और मंदिर, ॐ जय लक्ष्मी माता — लक्ष्मी जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ), ॐ जय शिव ओंकारा — शिव जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ), घर पर रोज़ की सरल पूजा विधि — 10-15 मिनट में, क्रम से

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