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ॐ जय शिव ओंकारा — शिव जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)

भगवान शिव की प्रसिद्ध आरती "ॐ जय शिव ओंकारा" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ, अतिरिक्त प्रचलित पद और आरती का तरीका।

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इस लेख में
  1. आरती के पूरे बोल
  2. सरल अर्थ
  3. आरती कैसे करें
  4. ध्यान रखने योग्य बातें

"ॐ जय शिव ओंकारा" भगवान शिव की सबसे प्रसिद्ध आरती है। सोमवार, महाशिवरात्रि, सावन के महीने और प्रदोष व्रत पर शिव मंदिरों और घरों में यही आरती गाई जाती है।

इस आरती की एक सुंदर बात है जो अक्सर ध्यान में नहीं आती: यह शिव को ओंकार (ॐ) के रूप में गाती है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों एक ही परमात्मा के तीन रूप हैं। कई पदों में एक साथ तीनों देवताओं के मुख, वाहन, वस्त्र और आयुध गिनाए गए हैं। अंतिम पद में "शिवानन्द स्वामी" का नाम आता है, जिन्हें इसका रचयिता माना जाता है।

आरती के पूरे बोल

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे॥ॐ जय शिव ओंकारा॥

अतिरिक्त पद जो कई घरों में गाए जाते हैं

आरती का एक लंबा रूप भी प्रचलित है, जिसमें अंतिम पद से पहले ये पद जोड़े जाते हैं:

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

पाठभेद: चौथे पद की दूसरी पंक्ति कई जगह "चन्दन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी" गाई जाती है, और अंतिम पंक्ति "मनवांछित फल पावे" भी। अपने घर में जो रूप चलता हो, वही गाइए।

सरल अर्थ

पहला पद: हे ओंकार स्वरूप शिव, आपकी जय हो। ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव, तीनों आप ही हैं, और माँ पार्वती को आपने अपने आधे अंग में धारण किया है (अर्धनारीश्वर रूप)।

दूसरा पद: एक मुख वाले (विष्णु), चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पाँच मुख वाले (शिव), तीनों रूपों में आप शोभा देते हैं। हंस पर (ब्रह्मा), गरुड़ पर (विष्णु) और नंदी बैल पर (शिव), तीनों वाहन आपके ही हैं।

तीसरा पद: आपके अलग-अलग रूपों में दो, चार और दस भुजाएँ हैं, जो बहुत सुंदर लगती हैं। सत्त्व, रज और तम, तीनों गुणों वाले आपके रूप को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।

चौथा पद: आप रुद्राक्ष की माला (ब्रह्मा), वनमाला (विष्णु) और मुंडों की माला (शिव) धारण करते हैं। आप ही त्रिपुरासुर का नाश करने वाले शिव हैं और आप ही कंस को मारने वाले कृष्ण (विष्णु) भी।

पाँचवाँ पद: सफ़ेद वस्त्र (ब्रह्मा), पीले वस्त्र (विष्णु) और बाघ की खाल (शिव) आपके अंगों पर हैं। आपके साथ सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि भक्त और भूत-गण, सब रहते हैं। यानी आपके पास हर तरह के प्राणी को जगह है।

छठा पद: आपके हाथों में कमंडलु (ब्रह्मा), चक्र (विष्णु) और त्रिशूल (शिव) हैं। आप सुख देने वाले, दुख हरने वाले और संसार का पालन करने वाले हैं।

सातवाँ पद: जिन्हें सच्ची समझ नहीं, वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव को अलग-अलग मानकर आपस में भेद करते हैं। पर ॐ (प्रणव) अक्षर में ये तीनों एक ही रूप में शोभित हैं। यही इस आरती का सबसे गहरा संदेश है।

अंतिम पद: शिवानंद स्वामी कहते हैं कि तीनों गुणों के स्वामी की यह आरती जो भी प्रेम से गाता है, उसके जीवन में सुख और शांति आती है।

अतिरिक्त पदों का भाव: लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती साथ हैं, जटाओं से गंगा बहती है, गले में मुंडमाला और शेषनाग हैं, आप कैलाश पर्वत पर रहते हैं, सादा भोजन और भस्म आपका श्रृंगार है। काशी में आप विश्वनाथ रूप में विराजते हैं। ये पद शिव के सरल, वैरागी स्वभाव को दिखाते हैं: जिनके पास सब कुछ है, वे सबसे सादा रहते हैं। शिव के नीलकंठ बनने की कथा पढ़ें: समुद्र मंथन की कथा — चौदह रत्न, माँ लक्ष्मी और नीलकंठ महादेव।

आरती कैसे करें

शिव पूजा में पहले जल या दूध से अभिषेक, फिर बेलपत्र, चंदन और फूल चढ़ाकर अंत में आरती करने का चलन है। आरती के बाद "हर हर महादेव" का जयकारा लगाया जाता है।

  • थाली में घी या तेल का दीपक (एक बत्ती या पाँच बत्ती, जैसा आपके घर में चलन हो), थोड़ा कपूर, फूल, अक्षत और जल रख लें।
  • साफ़ जगह पर बैठें या खड़े हों। बहुत से घरों में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पूजा करने का चलन है; अपने घर की परंपरा मानें।
  • थाली को घड़ी की सुई की दिशा में (दाहिनी ओर से) धीरे-धीरे घुमाएँ। एक प्रचलित तरीका है: चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे विग्रह के सामने सात बार। अलग-अलग परंपराओं में यह संख्या अलग हो सकती है, इसलिए इसे नियम नहीं, सहायक मार्गदर्शन समझें।
  • घंटी, शंख या ताली के साथ पूरा परिवार मिलकर गाए तो आरती का आनंद कई गुना हो जाता है।
  • आरती के बाद थाली सबके सामने ले जाएँ। दोनों हथेलियाँ दीपक की लौ के ऊपर घुमाकर आँखों और सिर से लगाएँ।

दीपक जलाते समय दुपट्टे, पर्दे और बच्चों का ध्यान रखें; आरती का भाव सबसे बड़ा है, दिखावा नहीं।

ध्यान रखने योग्य बातें

आगे पढ़ें: भगवान शिव — परिचय, स्वरूप का अर्थ, 12 ज्योतिर्लिंग और प्रसिद्ध मंदिर, महामृत्युंजय मंत्र — शब्दार्थ, भावार्थ और जप विधि, समुद्र मंथन की कथा — चौदह रत्न, माँ लक्ष्मी और नीलकंठ महादेव, ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ)

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