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जय गणेश जय गणेश देवा — गणेश जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)

गणेश जी की सबसे लोकप्रिय आरती "जय गणेश जय गणेश देवा" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ, प्रचलित पाठभेद और आरती का तरीका।

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इस लेख में
  1. आरती के पूरे बोल
  2. सरल अर्थ
  3. एक और प्रसिद्ध गणेश आरती
  4. आरती कैसे करें
  5. ध्यान रखने योग्य बातें

सनातन परंपरा में हर शुभ काम गणेश जी को याद करके शुरू होता है, क्योंकि वे विघ्नहर्ता (बाधाएँ दूर करने वाले) और बुद्धि के देवता हैं। इसलिए किसी भी पूजा में सबसे पहले उनकी आरती गाने का चलन है। दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा होती है, और गणेश चतुर्थी के दस दिन तो घर-घर यही आरती गूँजती है।

"जय गणेश जय गणेश देवा" उत्तर भारत में सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली गणेश आरती है। इसकी भाषा ब्रज-अवधी जैसी पुरानी लोक-हिंदी है। अंतिम पद में "सूर श्याम" आता है, इसलिए इसे संत सूरदास से जोड़ा जाता है, हालाँकि इसकी रचना के बारे में पक्के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते।

आरती के पूरे बोल

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एकदन्त दयावन्त, चार भुजा धारी।माथे सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी॥जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा॥
पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा।लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा॥
अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा॥
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा॥

प्रचलित पाठभेद (variant lines)

अलग-अलग इलाकों में कुछ शब्द बदलकर भी गाए जाते हैं, जैसे:

  • "पान चढ़े फल चढ़े" की जगह "हार चढ़े फूल चढ़े" या "पान चढ़े फूल चढ़े"।
  • "माथे सिन्दूर सोहे" की जगह "माथे पर तिलक सोहे"।
  • बहुत से घरों में अंत में यह पद भी जोड़ा जाता है:
दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतकारी।कामना को पूर्ण करो, जाऊँ बलिहारी॥

सरल अर्थ

टेक (मुख्य पंक्ति): हे गणेश देव, आपकी जय हो, जय हो। आपकी माता पार्वती जी हैं और पिता महादेव शिव जी।

दूसरा पद: आपका एक दाँत है, आप बहुत दयालु हैं और चार भुजाएँ धारण करते हैं। आपके माथे पर सिंदूर शोभा देता है और आप चूहे (मूषक) की सवारी करते हैं। छोटा-सा मूषक यह भी सिखाता है कि भगवान के लिए कोई प्राणी छोटा नहीं।

तीसरा पद: भक्त आपको पान, फल और मेवा चढ़ाते हैं। आपको लड्डुओं (मोदक) का भोग प्यारा है और संत-महात्मा प्रेम से आपकी सेवा करते हैं।

चौथा पद: आपकी कृपा से जो देख नहीं पाता उसे राह दिखती है, बीमार को स्वस्थ शरीर मिलता है, संतान की कामना वाले को संतान और गरीब को धन मिलता है। यह भक्त का विश्वास है कि गणेश जी दुखी की हर पुकार सुनते हैं; इसका अर्थ यह नहीं कि इलाज या मेहनत छोड़ दी जाए।

पाँचवाँ पद: कवि कहता है: हे प्रभु, मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी सेवा को सफल कीजिए। आप पार्वती और महादेव के प्यारे पुत्र हैं।

अतिरिक्त पद: हे शिव जी के पुत्र, दीन-दुखियों की लाज रखिए और हमारी अच्छी इच्छाएँ पूरी कीजिए; हम आप पर न्योछावर हैं।

एक और प्रसिद्ध गणेश आरती

महाराष्ट्र और देश के कई हिस्सों में मराठी आरती "सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची" भी बहुत प्रिय है, जिसकी रचना संत समर्थ रामदास स्वामी से जोड़ी जाती है। गणेश चतुर्थी पर अक्सर दोनों आरतियाँ गाई जाती हैं।

आरती कैसे करें

किसी भी पूजा में गणेश जी की आरती सबसे पहले गाने का चलन है। दूर्वा (दूब घास) और लड्डू या मोदक गणेश जी को प्रिय माने जाते हैं, पर जो भी सच्चे मन से हो सके, वही काफ़ी है।

  • थाली में घी या तेल का दीपक (एक बत्ती या पाँच बत्ती, जैसा आपके घर में चलन हो), थोड़ा कपूर, फूल, अक्षत और जल रख लें।
  • साफ़ जगह पर बैठें या खड़े हों। बहुत से घरों में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पूजा करने का चलन है; अपने घर की परंपरा मानें।
  • थाली को घड़ी की सुई की दिशा में (दाहिनी ओर से) धीरे-धीरे घुमाएँ। एक प्रचलित तरीका है: चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे विग्रह के सामने सात बार। अलग-अलग परंपराओं में यह संख्या अलग हो सकती है, इसलिए इसे नियम नहीं, सहायक मार्गदर्शन समझें।
  • घंटी, शंख या ताली के साथ पूरा परिवार मिलकर गाए तो आरती का आनंद कई गुना हो जाता है।
  • आरती के बाद थाली सबके सामने ले जाएँ। दोनों हथेलियाँ दीपक की लौ के ऊपर घुमाकर आँखों और सिर से लगाएँ।

दीपक जलाते समय दुपट्टे, पर्दे और बच्चों का ध्यान रखें; आरती का भाव सबसे बड़ा है, दिखावा नहीं।

ध्यान रखने योग्य बातें

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