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हनुमान चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ

गोस्वामी तुलसीदास रचित पूरी हनुमान चालीसा (दोहे, 40 चौपाइयाँ और अंतिम दोहा), हर चौपाई का सरल अर्थ और पाठ करने का आसान तरीका।

📖 ९ मिनट पढ़ें
इस लेख में
  1. प्रारंभिक दोहे
  2. चौपाई 1 से 10
  3. चौपाई 11 से 20
  4. चौपाई 21 से 30
  5. चौपाई 31 से 40
  6. अंतिम दोहा
  7. पाठ कैसे करें
  8. ध्यान रखने योग्य बातें

हनुमान चालीसा भारत में सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला भक्ति-पाठ है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में की थी, वही संत जिन्होंने श्रीरामचरितमानस लिखा। "चालीसा" का अर्थ है चालीस चौपाइयों का संग्रह। शुरुआत में दो दोहे हैं और अंत में एक दोहा।

बहुत से लोग इसे रोज़ सुबह या शाम पढ़ते हैं, और मंगलवार-शनिवार को विशेष रूप से। इसे पढ़ने में लगभग 8 से 10 मिनट लगते हैं।

सुनते-सुनते याद करना चाहते हैं? हनुमान चालीसा ऑडियो सुनें या ई-बुक में पढ़ें।

प्रारंभिक दोहे

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

अर्थ: गुरु के कमल जैसे चरणों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को साफ़ करके मैं श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों फल देने वाला है। अपने को बुद्धि में कमज़ोर जानकर मैं पवनपुत्र हनुमान को याद करता हूँ। हे हनुमान, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए, और मेरे दुख तथा मन के दोष दूर कीजिए।

चौपाई 1 से 10

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ 1राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥ 2

अर्थ: हे हनुमान, आप ज्ञान और गुणों के समुद्र हैं, वानरों के राजा हैं और तीनों लोकों में आपकी कीर्ति फैली है। आप श्रीराम के दूत हैं, अपार बल के भंडार हैं, और अंजनी के पुत्र तथा पवनपुत्र कहलाते हैं।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥ 3कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥ 4

अर्थ: आप महावीर हैं, पराक्रमी हैं, आपका शरीर वज्र जैसा मज़बूत है (बजरंगी)। आप बुरी सोच को दूर करते हैं और अच्छी सोच वालों के साथी हैं। आपका रंग सोने जैसा है, सुंदर वेश है, कानों में कुंडल और बाल घुँघराले हैं।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥ 5संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन॥ 6

अर्थ: आपके हाथ में वज्र (गदा) और ध्वजा है, कंधे पर मूँज का जनेऊ है। आप शंकर जी के अंश माने जाते हैं और वानरराज केसरी के पुत्र हैं; आपके तेज और प्रताप की पूरा संसार वंदना करता है।

बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥ 7प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥ 8

अर्थ: आप विद्वान, गुणवान और बहुत समझदार हैं, और श्रीराम का काम करने को हमेशा उत्सुक रहते हैं। प्रभु की कथा सुनने में आपको आनंद आता है, और राम, लक्ष्मण तथा सीता आपके मन में बसते हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ 9भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥ 10

अर्थ: आपने छोटा रूप धरकर अशोक वाटिका में सीता जी को दर्शन दिए, और विशाल रूप धरकर लंका जलाई। भयंकर रूप धरकर राक्षसों का नाश किया और श्रीराम के सारे काम पूरे किए।

चौपाई 11 से 20

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥ 11रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥ 12

अर्थ: आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राण बचाए, तो श्रीराम ने प्रसन्न होकर आपको गले लगा लिया। उन्होंने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा: तुम मुझे भरत जैसे ही प्यारे भाई हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ 13सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥ 14

अर्थ: "हज़ार मुख वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाते हैं", ऐसा कहकर श्रीराम ने आपको फिर गले लगाया। सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, बड़े-बड़े मुनि, नारद, सरस्वती और नागराज शेष भी आपका गुण गाते हैं।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥ 15तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥ 16

अर्थ: यमराज, कुबेर और दिशाओं के रक्षक देवता भी आपकी महिमा पूरी नहीं कह सकते, तो साधारण कवि और विद्वान कैसे कहेंगे? आपने सुग्रीव पर बड़ा उपकार किया: उन्हें श्रीराम से मिलवाया और उन्हें राज्य वापस मिला।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥ 17जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ 18

अर्थ: विभीषण ने आपकी सलाह मानी और वे लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है। बचपन में आपने बहुत दूर स्थित सूर्य को मीठा फल समझकर मुँह में रख लिया था। (यहाँ कवि सूर्य की अपार दूरी बताकर हनुमान जी की शक्ति दिखा रहे हैं।)

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥ 19दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ 20

अर्थ: प्रभु श्रीराम की अँगूठी मुँह में रखकर आपने समुद्र पार कर लिया, आपके लिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं। संसार में जितने भी कठिन काम हैं, आपकी कृपा से वे सब आसान हो जाते हैं।

चौपाई 21 से 30

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ 21सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥ 22

अर्थ: आप श्रीराम के द्वार के रक्षक हैं; आपकी अनुमति के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता। जो आपकी शरण में आता है, उसे सुख मिलता है; जब आप रक्षक हैं, तो किसी से डरने की ज़रूरत नहीं।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥ 23भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ 24

अर्थ: अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं; आपकी एक हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं। जो महावीर का नाम लेता है, उसके पास कोई भी बुरी शक्ति नहीं फटकती। (भक्त के लिए इसका सबसे सुंदर अर्थ है: हनुमान जी का नाम मन से डर भगा देता है।)

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ 25संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ 26

अर्थ: वीर हनुमान का लगातार स्मरण करने से रोग और पीड़ा का बल घटता है, ऐसा भक्तों का विश्वास है। जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे वे संकट से निकाल लेते हैं।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥ 27और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥ 28

अर्थ: तपस्वी राजा श्रीराम सबसे श्रेष्ठ हैं, और उनके सारे काम आपने ही सँवारे। जो भी आपके पास कोई और इच्छा लेकर आता है, उसे जीवन का भरपूर फल मिलता है।

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥ 29साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥ 30

अर्थ: चारों युगों में आपका प्रताप फैला है और आपकी कीर्ति से संसार में उजाला है। आप साधु-संतों के रक्षक हैं, दुष्टों का नाश करने वाले हैं और श्रीराम के बहुत प्यारे हैं।

चौपाई 31 से 40

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥ 31राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥ 32

अर्थ: माता सीता ने आपको वरदान दिया कि आप आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाले होंगे। राम-भक्ति रूपी अमृत आपके पास है; आप सदा श्रीराम के सेवक बने रहें।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥ 33अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥ 34

अर्थ: आपका भजन करने से श्रीराम मिलते हैं और जन्म-जन्म के दुख भूल जाते हैं। ऐसा भक्त अंत समय में श्रीराम के धाम जाता है, और यदि फिर जन्म ले तो भगवान का भक्त ही कहलाता है।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ 35संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ 36

अर्थ: मन में और किसी का ध्यान न भी करे, तो भी हनुमान जी की सेवा से सब सुख मिलते हैं। जो बलवान वीर हनुमान को याद करता है, उसके संकट कटते हैं और पीड़ा मिटती है। (यह भक्त का अपने इष्ट के प्रति प्रेम है, दूसरे देवताओं का अनादर नहीं।)

जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ 37जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥ 38

अर्थ: हे स्वामी हनुमान, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! जैसे गुरु शिष्य पर कृपा करते हैं, वैसे ही मुझ पर कृपा कीजिए। जो इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधनों से छूटकर महान सुख पाता है।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥ 39तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ 40

अर्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसका पाठ सफल होता है; इसके साक्षी स्वयं शिव जी (गौरी के पति) हैं। तुलसीदास कहते हैं: मैं सदा प्रभु का सेवक हूँ; हे नाथ, मेरे हृदय में निवास कीजिए।

अंतिम दोहा

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

अर्थ: हे पवनपुत्र, आप संकट हरने वाले और मंगल की मूर्ति हैं। हे देवताओं के राजा, आप श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी के साथ मेरे हृदय में बसिए।

पाठ कैसे करें

  • सुबह स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाकर, शांत जगह पर बैठकर पाठ करें। हनुमान जी या श्रीराम दरबार का चित्र सामने हो तो अच्छा, न हो तो भी मन से याद करना काफ़ी है।
  • बहुत से लोग पाठ से पहले "श्रीराम जय राम जय जय राम" बोलते हैं, क्योंकि हनुमान जी राम-नाम से सबसे ज़्यादा प्रसन्न माने जाते हैं।
  • एक बार, तीन बार, सात बार या ग्यारह बार, जितना समय हो उतना पढ़ें। संख्या की परंपराएँ अलग-अलग हैं; रोज़ का एक पाठ भी मन लगाकर हो तो सुंदर है।
  • पाठ के बाद हनुमान जी की आरती गाई जा सकती है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • शब्दों का उच्चारण धीरे-धीरे सीखें; ऑडियो के साथ पढ़ने से यह आसान हो जाता है।
  • हनुमान चालीसा डर भगाने और मन को मज़बूत करने का साधन है। बीमारी में डॉक्टर की सलाह और मेहनत के साथ प्रार्थना करें, उनकी जगह नहीं।
  • कुछ पुस्तकों में छोटे-मोटे पाठभेद मिलते हैं (जैसे "संकर सुवन" की जगह "संकर स्वयं"); ये सब प्रचलित हैं।

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