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श्रीराम की अयोध्या वापसी — दीपावली की कथा

चौदह वर्ष के वनवास के बाद श्रीराम का अयोध्या लौटना, भरत से मिलन और राज्याभिषेक — दीपावली से जुड़ी सबसे प्यारी कथा।

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इस लेख में
  1. कथा
  2. दीये कहाँ से आए?
  3. कथा से सीख
  4. परिवार के लिए

दीपावली की रात जब घर-घर दीये जलते हैं, तो सबसे पहले जो कथा याद आती है, वह है श्रीराम के अयोध्या लौटने की। यह कथा मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के अंतिम सर्गों में मिलती है। आइए, इसे परिवार के साथ बैठकर पढ़ें।

कथा

लंका का युद्ध समाप्त हो चुका था। रावण का अंत हुआ और श्रीराम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया। माता सीता से मिलन हुआ। अब श्रीराम के मन में एक ही बात थी — अयोध्या, जहाँ उनका छोटा भाई भरत चौदह वर्ष से उनकी राह देख रहा था।

विभीषण ने श्रीराम को पुष्पक विमान भेंट किया। श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण उसमें बैठे। साथ में सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जाम्बवान और विभीषण भी चल पड़े, क्योंकि सब श्रीराम का राज्याभिषेक अपनी आँखों से देखना चाहते थे।

रास्ते भर श्रीराम माता सीता को वे स्थान दिखाते गए जहाँ-जहाँ वनवास और युद्ध की घटनाएँ हुई थीं — समुद्र पर बना सेतु, किष्किंधा, पंपा सरोवर, चित्रकूट। हर जगह के साथ एक याद जुड़ी थी, कुछ दुख की, कुछ मित्रता की।

भरत की प्रतिज्ञा

उधर अयोध्या के पास नंदिग्राम में भरत एक तपस्वी की तरह रह रहे थे। वे राजमहल में नहीं रहते थे। उन्होंने श्रीराम की खड़ाऊँ (पादुकाएँ) सिंहासन पर रखी थीं और स्वयं को केवल उनका सेवक मानकर राज-काज चलाते थे। भरत ने प्रण किया था कि यदि चौदह वर्ष पूरे होने पर भैया नहीं लौटे, तो वे अपने प्राण त्याग देंगे।

श्रीराम यह बात जानते थे। इसलिए उन्होंने रास्ते में भरद्वाज मुनि के आश्रम पर रुककर हनुमान जी को आगे भेजा। हनुमान जी पहले शृंगवेरपुर में निषादराज गुह को, और फिर नंदिग्राम पहुँचकर भरत को यह शुभ समाचार दिया कि श्रीराम लौट रहे हैं।

यह सुनकर भरत आनंद से भर गए। उन्होंने हनुमान जी को गले लगा लिया और कहा कि इतना सुखद समाचार देने वाले को मैं क्या दूँ! वर्षों बाद उनके मुख पर सच्ची मुस्कान आई।

अयोध्या सजी

भरत ने शत्रुघ्न को आज्ञा दी कि पूरी अयोध्या सजाई जाए। रास्ते साफ़ किए गए, उन पर पानी छिड़का गया, फूल बिछाए गए। घरों पर ध्वजाएँ और पताकाएँ लहराने लगीं। वाद्य बजने लगे। माताएँ — कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी — भी स्वागत के लिए निकलीं। नगर के लोग, मंत्री, गुरुजन, सब नंदिग्राम की ओर उमड़ पड़े।

जब आकाश में पुष्पक विमान दिखा, तो चारों ओर जय-जयकार गूँज उठी। विमान उतरा। भरत दौड़कर आगे बढ़े और श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। चौदह वर्ष की दूरी एक ही क्षण में मिट गई।

भरत ने अपने हाथों से वे पादुकाएँ श्रीराम के चरणों में पहना दीं और कहा — "भैया, आपकी यह धरोहर मैंने संभालकर रखी थी, आज इसे आपको लौटाता हूँ।" श्रीराम ने तीनों माताओं को प्रणाम किया, गुरु वसिष्ठ का आशीर्वाद लिया।

राज्याभिषेक

इसके बाद गुरु वसिष्ठ और अन्य ऋषियों ने विधि-विधान से श्रीराम का राज्याभिषेक किया। श्रीराम और सीता सिंहासन पर विराजे। वाल्मीकि रामायण में एक सुंदर प्रसंग है — श्रीराम ने माता सीता को मोतियों का एक हार दिया, और सीता जी ने श्रीराम की ओर देखकर, उनकी अनुमति से, वह हार हनुमान जी को भेंट कर दिया। सबसे सच्चे सेवक को सबसे सुंदर उपहार मिला।

इसके बाद जो शासन चला, उसे आज भी "रामराज्य" कहा जाता है — जहाँ प्रजा सुखी थी, कोई भूखा या दुखी नहीं था, और राजा प्रजा को अपनी संतान की तरह मानता था।

दीये कहाँ से आए?

सच्ची बात: वाल्मीकि रामायण श्रीराम की वापसी, नगर की सजावट और राज्याभिषेक का विस्तार से वर्णन करती है, पर उसमें कार्तिक अमावस्या की रात दीये जलाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।

श्रीराम की वापसी की ख़ुशी में दीप जलाकर दीपावली मनाने की परंपरा लोक परंपरा और बाद के ग्रंथों व मान्यताओं से आई है, और सदियों से पूरे भारत में प्रेम से निभाई जाती है। अर्थ साफ़ है — जैसे अयोध्या ने अपने राम का स्वागत उजाले से किया, वैसे ही हम भी अपने घर और मन में अच्छाई का स्वागत करते हैं।

दीपावली से और भी कथाएँ जुड़ी हैं, जैसे समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मी का प्रकट होना (समुद्र मंथन की कथा — चौदह रत्न, माँ लक्ष्मी और नीलकंठ महादेव) और नरकासुर पर विजय (नरकासुर वध की कथा — श्रीकृष्ण, सत्यभामा और सोलह हज़ार कन्याओं की मुक्ति)। इसीलिए यह पर्व इतना बड़ा और इतना रंग-बिरंगा है।

कथा से सीख

  • भाई का प्रेम: भरत ने राज्य मिलने पर भी उसे अपना नहीं माना। सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, ज़िम्मेदारी देखता है।
  • वचन का पालन: श्रीराम ने पिता के वचन के लिए चौदह वर्ष वन में बिताए, और भरत की प्रतिज्ञा का मान रखने के लिए समय पर लौटे।
  • सेवा का सम्मान: हनुमान जी को मिला हार बताता है कि निःस्वार्थ सेवा सबसे ऊँचा स्थान पाती है।
  • अंधेरे के बाद उजाला: कठिन समय कितना भी लंबा हो, धैर्य और धर्म के साथ चलने वाले का "घर लौटना" निश्चित है।

परिवार के लिए

बच्चों से पूछिए — अगर आप भरत की जगह होते तो क्या करते? और दीया जलाते समय एक अच्छी आदत अपनाने का संकल्प लीजिए। यही असली दीपोत्सव है।

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