नरकासुर वध की कथा — श्रीकृष्ण, सत्यभामा और सोलह हज़ार कन्याओं की मुक्ति
अत्याचारी नरकासुर का अंत और बंदी बनाई गई हज़ारों कन्याओं की मुक्ति — नरक चतुर्दशी (छोटी दीवाली) से जुड़ी कथा।
इस लेख में
दीपावली से एक दिन पहले कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी मनाई जाती है, जिसे छोटी दीवाली भी कहते हैं। इस दिन की कथा है — श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का अंत। यह कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कंध, अध्याय 59) में मिलती है, और विष्णु पुराण व लोक परंपराओं में भी।
कथा
कौन था नरकासुर?
नरकासुर को भौमासुर भी कहते हैं, क्योंकि वह भूमि (पृथ्वी देवी) का पुत्र माना गया है। उसकी राजधानी थी प्राग्ज्योतिषपुर, जिसे आज के असम (कामरूप) क्षेत्र से जोड़ा जाता है।
शक्ति पाकर नरकासुर घमंड में अंधा हो गया। उसने देवताओं को सताया, वरुण देव का दिव्य छत्र छीन लिया, देवमाता अदिति के कुंडल छीन लिए, और देवताओं के एक पर्वत "मणि पर्वत" पर भी कब्ज़ा कर लिया। सबसे बड़ा अत्याचार यह था कि उसने अनेक राज्यों से हज़ारों राजकुमारियों और कन्याओं का अपहरण करके उन्हें बंदी बना रखा था।
इंद्र की पुकार
दुखी होकर देवराज इंद्र द्वारका पहुँचे और श्रीकृष्ण से सहायता माँगी। श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को साथ लिया, गरुड़ पर सवार हुए और प्राग्ज्योतिषपुर की ओर चल पड़े।
किले के घेरे
नरकासुर का नगर बहुत सुरक्षित था। उसके चारों ओर पहाड़ों की दीवारें थीं, शस्त्रों के घेरे थे, जल और अग्नि की खाइयाँ थीं, आँधी जैसी हवा का घेरा था, और सबसे ऊपर मुर नाम के दैत्य के बिछाए हुए हज़ारों मज़बूत फंदे (पाश) थे।
श्रीकृष्ण ने गदा से पहाड़ तोड़े, बाणों से शस्त्रों के घेरे काटे, सुदर्शन चक्र से जल, अग्नि और वायु के घेरे पार किए, और तलवार से मुर के फंदे काट डाले। फिर उन्होंने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया।
मुर का अंत — "मुरारि"
शंख की गूँज सुनकर पाँच सिर वाला दैत्य मुर जल के भीतर से निकला और त्रिशूल लेकर दौड़ा। भीषण युद्ध हुआ और अंत में श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका अंत कर दिया। इसीलिए भगवान का एक नाम पड़ा — मुरारि (मुर के शत्रु)। इसके बाद मुर के सात पुत्र भी लड़ने आए और वे भी हार गए।
नरकासुर से युद्ध
अब स्वयं नरकासुर अपनी विशाल सेना और हाथियों के साथ निकला। गरुड़ पर बैठे श्रीकृष्ण और सत्यभामा को देखकर उसने भयंकर आक्रमण किया। श्रीकृष्ण ने उसकी सेना को तितर-बितर कर दिया और अंत में सुदर्शन चक्र से नरकासुर का अंत किया।
परंपराओं में अंतर: भागवत पुराण में नरकासुर का वध श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं और सत्यभामा उनके साथ होती हैं। कुछ पुराणों और कई क्षेत्रीय परंपराओं में सत्यभामा स्वयं नरकासुर पर बाण चलाती हैं, क्योंकि उसे अपनी माता (भूमि) के हाथों ही मरने का वरदान/शाप माना गया था, और सत्यभामा को भूमि देवी का अंश कहा गया है।
भूमि देवी की प्रार्थना
युद्ध के बाद भूमि देवी स्वयं आईं। उन्होंने अदिति के कुंडल, वरुण का छत्र और अन्य वस्तुएँ श्रीकृष्ण को लौटा दीं। उन्होंने भगवान की स्तुति की और अपने पोते भगदत्त (नरकासुर के पुत्र) के लिए अभय माँगा। श्रीकृष्ण ने भगदत्त को अभय दिया और वही आगे प्राग्ज्योतिषपुर का राजा बना। पुत्र के अपराध का दंड पोते को नहीं मिला — यह भी भगवान का न्याय था।
सोलह हज़ार कन्याओं की मुक्ति
फिर श्रीकृष्ण नरकासुर के महल में गए, जहाँ हज़ारों राजकुमारियाँ बंदी थीं। भागवत पुराण उनकी संख्या सोलह हज़ार एक सौ बताता है; लोक में इसे "सोलह हज़ार" कहा जाता है।
वर्षों से बंदी उन कन्याओं को डर था कि अब समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने श्रीकृष्ण को अपना रक्षक माना और उन्हीं को पति रूप में स्वीकार करने की इच्छा रखी। श्रीकृष्ण ने उन्हें सम्मानपूर्वक द्वारका भेजा और सबसे विवाह करके उन्हें पूरा मान और सुरक्षा दी। जिनका किसी ने साथ नहीं दिया, उनका भगवान ने साथ दिया।
इसके बाद श्रीकृष्ण अदिति के कुंडल लौटाने स्वर्ग गए। वहीं से सत्यभामा की इच्छा पर पारिजात वृक्ष द्वारका लाने का प्रसंग भी जुड़ा है।
नरक चतुर्दशी से संबंध
लोक मान्यता है कि नरकासुर पर यह विजय कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हुई। इसलिए इस दिन सुबह जल्दी उठकर तेल-उबटन लगाकर स्नान करने (अभ्यंग स्नान), घर साफ़ करने और शाम को दीये जलाने की परंपरा है। कई जगह इसे "रूप चौदस" भी कहते हैं। कुछ परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि अंत समय में नरकासुर ने प्रार्थना की थी कि इस दिन को लोग दीये जलाकर याद रखें। विधि और तिथि के लिए पढ़ें: नरक चतुर्दशी और छोटी दीपावली 2026 — अभ्यंग स्नान, यम दीपक और कथा।
कथा से सीख
- अन्याय कितना भी मज़बूत हो, टिकता नहीं: पहाड़, आग, पानी, फंदे — कोई घेरा नरकासुर को बचा नहीं सका।
- स्त्री का सम्मान: श्रीकृष्ण ने बंदी कन्याओं को दया नहीं, पूरा सम्मान दिया। पीड़ित का साथ देना ही धर्म है।
- साथ में शक्ति: सत्यभामा का युद्ध में साथ होना बताता है कि धर्म के काम में पति-पत्नी साझेदार हैं।
- भीतर का नरकासुर: आलस्य, क्रोध और बुरी आदतें भी हमारे भीतर के "असुर" हैं; छोटी दीवाली की सफ़ाई उन्हें भी बाहर करने का अवसर है।
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