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गोवर्धन लीला — जब श्रीकृष्ण ने उँगली पर पर्वत उठाया

इंद्र के घमंड से आई प्रलय जैसी वर्षा में बालक कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर पूरे ब्रज की रक्षा की — गोवर्धन पूजा की कथा।

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इस लेख में
  1. कथा
  2. आज की परंपरा
  3. कथा से सीख

दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का उत्सव होता है। घर-घर गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है और भगवान को छप्पन भोग जैसे ढेर सारे पकवान चढ़ाए जाते हैं। इसके पीछे की प्यारी कथा श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कंध, अध्याय 24–27) में मिलती है।

कथा

इंद्र-यज्ञ की तैयारी

ब्रज में हर साल वर्षा के देवता इंद्र के लिए एक बड़ा यज्ञ होता था। उस साल भी नंद बाबा और सभी गोप तैयारी में लगे थे — घी, दूध, पकवान, सब इकट्ठा हो रहा था।

सात वर्ष के नन्हे कृष्ण ने यह देखा और बड़े भोलेपन से पूछा — "बाबा, यह सब किसके लिए हो रहा है? इससे क्या मिलेगा?"

नंद बाबा ने समझाया — "बेटा, इंद्र देव बादलों के स्वामी हैं। वे वर्षा करते हैं, जिससे घास उगती है, हमारी गायें चरती हैं और हमारा जीवन चलता है। इसलिए हम हर साल उनकी पूजा करते हैं।"

कृष्ण की बात

कृष्ण ने कहा — "बाबा, हर जीव अपने कर्म से सुख-दुख पाता है। वर्षा तो बादल प्रकृति के नियम से करते हैं। हम ग्वाले हैं, हमारा जीवन तो गायों, वन और इस गोवर्धन पर्वत से चलता है। यही पर्वत हमारी गायों को घास देता है, हमें जल, फल और छाया देता है। तो क्यों न इस बार हम गोवर्धन की, गायों की और ब्राह्मणों की पूजा करें?"

कृष्ण ने सुझाव दिया कि जो पकवान बने हैं, उनका भोग गोवर्धन को लगाया जाए, ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए, गायों को अच्छा चारा दिया जाए, गरीबों और यहाँ तक कि कुत्तों तक को खिलाया जाए, और सब मिलकर पर्वत की परिक्रमा करें।

बालक की बात में इतना प्रेम और सच्चाई थी कि नंद बाबा और सब गोप मान गए। सबने मिलकर ऐसा ही किया। उस दिन ढेर सारे पकवानों का जो "अन्न का पहाड़" (अन्नकूट) बना, वही आज के अन्नकूट उत्सव की परंपरा है। भागवत में आता है कि कृष्ण ने स्वयं एक विशाल रूप धारण करके कहा "मैं ही गोवर्धन हूँ" और भोग स्वीकार किया।

इंद्र का क्रोध

जब इंद्र को पता चला कि उनकी पूजा बंद करके एक पर्वत को पूजा गया है, तो वे अपमान से तिलमिला उठे। उन्होंने प्रलय करने वाले "सांवर्तक" नाम के बादलों को आज्ञा दी कि जाकर पूरे ब्रज को डुबो दो।

आकाश काला हो गया। बिजली कड़कने लगी, भयंकर आँधी चली और मूसलाधार बारिश, ओलों के साथ, ब्रज पर टूट पड़ी। गायें काँपने लगीं, बछड़े अपनी माँ से चिपक गए, लोग "कृष्ण! कृष्ण! हमें बचाओ" पुकारते हुए नंदभवन की ओर भागे।

उँगली पर पर्वत

कृष्ण ने सबको धीरज दिया और गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। फिर जैसे कोई बच्चा खेल-खेल में ज़मीन से कुकुरमुत्ता उखाड़ लेता है, वैसे ही उन्होंने एक हाथ से पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया। लोक में प्रसिद्ध है कि उन्होंने उसे अपनी बाएँ हाथ की सबसे छोटी उँगली पर छाते की तरह थाम लिया।

कृष्ण बोले — "माँ, बाबा, सब आ जाओ, अपनी गायों और सामान के साथ पर्वत के नीचे आ जाओ। डरो मत, यह गिरेगा नहीं।" पूरा ब्रज, गायें, बछड़े, गाड़ियाँ — सब उस विशाल छाते के नीचे सुरक्षित आ गए।

सात दिन और सात रात बारिश होती रही। सात दिन तक कृष्ण भूख-प्यास भूलकर, मुस्कुराते हुए पर्वत थामे खड़े रहे। ब्रजवासी उनका मुख देखते रहे और उन्हें समय का पता ही नहीं चला।

इंद्र का पछतावा

सात दिन बाद इंद्र समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान हैं। उन्होंने बादलों को लौटा लिया। आकाश साफ़ हुआ, धूप निकली। कृष्ण ने सबसे बाहर निकलने को कहा और फिर पर्वत को धीरे से उसकी जगह रख दिया। ब्रजवासियों ने उन्हें गले लगा लिया, आशीर्वाद दिए, दही-अक्षत से उनका तिलक किया।

बाद में इंद्र, कामधेनु (सुरभि) गाय के साथ, कृष्ण के पास आए और हाथ जोड़कर क्षमा माँगी — "प्रभु, मैं अपने पद के घमंड में अंधा हो गया था।" कृष्ण ने उन्हें क्षमा किया और समझाया कि पद सेवा के लिए होता है, घमंड के लिए नहीं। कामधेनु ने अपने दूध से और इंद्र ने आकाशगंगा के जल से कृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें "गोविंद" नाम दिया — गायों के रक्षक, गायों के इंद्र।

आज की परंपरा

इसी की याद में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (दीपावली के अगले दिन) गोवर्धन पूजा होती है। गोबर से गोवर्धन बनाकर उसकी पूजा और परिक्रमा की जाती है, गायों को सजाया जाता है और अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। मथुरा के पास गोवर्धन पर्वत की लगभग 21 किलोमीटर की परिक्रमा आज भी लाखों भक्त करते हैं। पूजा की विधि: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट 2026 — 10 नवंबर: विधि, मुहूर्त और महत्व।

कथा से सीख

  • प्रकृति का आभार: जो पर्वत, नदी, पेड़ और पशु हमें जीवन देते हैं, उनका सम्मान करना भी पूजा है।
  • घमंड टूटता है: इंद्र जैसे बड़े देवता का घमंड भी टिक नहीं पाया। बड़ा पद सेवा की ज़िम्मेदारी है।
  • सबको साथ लेना: कृष्ण ने अकेले नहीं, सबको अपने छाते के नीचे लिया। अन्नकूट में भी सबके लिए भोजन है — गरीब से लेकर पशु तक।
  • भगवान पर भरोसा: संकट कितना भी बड़ा हो, जो शरण में आता है, उसकी रक्षा होती है।

आगे पढ़ें: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट 2026 — 10 नवंबर: विधि, मुहूर्त और महत्व, आरती कुंजबिहारी की — श्रीकृष्ण की आरती (पूरे बोल और अर्थ), दीपावली 2026 — तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और पाँच दिन का पूरा कैलेंडर, भाई दूज 2026 — 11 नवंबर: तिलक मुहूर्त, विधि और यम-यमुना की कथा

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