यम और यमुना की कथा — भाई दूज क्यों मनाते हैं
बहन यमुना के बार-बार बुलाने पर यमराज एक दिन उसके घर पहुँचे — उसी स्नेह भरे दिन से भाई दूज की परंपरा जुड़ी है।
दीपावली का पाँच दिन का उत्सव भाई दूज पर पूरा होता है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया के इस दिन बहनें भाई को तिलक करती हैं, उसकी लंबी आयु की कामना करती हैं और प्रेम से भोजन कराती हैं। इस दिन को यम द्वितीया भी कहते हैं, और इसके पीछे की कथा है मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना की। यम द्वितीया का माहात्म्य पुराण-परंपरा में मिलता है, और यह कथा लोक परंपरा में पीढ़ियों से सुनाई जाती है; अलग-अलग क्षेत्रों में इसके छोटे-छोटे रूप थोड़े बदलते हैं।
कथा
सूर्य देव की संतान
सूर्य देव और उनकी पत्नी संज्ञा की दो संतानें थीं — पुत्र यम और पुत्री यमी, जो आगे चलकर यमुना नदी के रूप में धरती पर बहीं। दोनों भाई-बहन में बहुत प्रेम था।
बड़े होकर दोनों की राहें अलग हो गईं। यम को धर्मराज का पद मिला — हर जीव के कर्मों का न्याय करने का काम। यह इतना बड़ा उत्तरदायित्व था कि उन्हें एक पल की भी फ़ुरसत नहीं मिलती थी। यमुना धरती पर बहती हुई सबको जीवन देने लगीं।
बहन का बुलावा
यमुना अपने भाई को बहुत याद करती थीं। वे बार-बार संदेश भेजतीं — "भैया, एक बार मेरे घर आओ। मैं अपने हाथ से तुम्हें भोजन कराना चाहती हूँ।"
यमराज हर बार सोचते — "जाऊँगा, ज़रूर जाऊँगा," पर काम की भीड़ में बात टलती रही। दिन बीते, बरस बीते। यमुना की प्रतीक्षा बनी रही, पर उनका स्नेह कभी कम नहीं हुआ।
वह शुभ दिन
एक दिन, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, यमराज ने ठान लिया — "आज चाहे जो हो, बहन के घर जाऊँगा।" कहते हैं, उस दिन उन्होंने नरक में कष्ट भोग रहे जीवों को भी कुछ समय के लिए राहत दे दी, ताकि उनका यह शुभ दिन किसी के लिए दुख का दिन न बने।
जब यमुना ने द्वार पर अपने भाई को देखा, तो उनकी आँखें ख़ुशी से भर आईं। जिसके आने से संसार डरता है, उसी का बहन ने हँसकर, खुले दिल से स्वागत किया।
यमुना ने स्नान करके भाई की आरती उतारी, माथे पर तिलक लगाया, हाथ में कलावा बाँधा और बड़े प्रेम से तरह-तरह के पकवान बनाकर अपने हाथों से भोजन कराया। यमराज ने इतने स्नेह से कभी भोजन नहीं किया था। उनका कठोर हृदय भी उस दिन पिघल गया।
यमुना का वरदान
भोजन के बाद प्रसन्न होकर यमराज बोले — "बहन, आज तुमने मेरा मन जीत लिया। कुछ भी माँग लो।"
यमुना ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने कहा — "भैया, हर साल इसी दिन तुम मेरे घर आया करो। और जो भी भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर उससे तिलक करवाए और उसके हाथ का भोजन करे, उस पर तुम्हारी कृपा बनी रहे, उसे तुम्हारा भय न सताए।"
यमराज ने मुस्कुराकर कहा — "तथास्तु।" उन्होंने बहन को सुंदर वस्त्र और आभूषण भेंट किए और विदा ली।
तभी से इस दिन को यम द्वितीया या भाई दूज के रूप में मनाया जाने लगा। इसी कथा से वह परंपरा भी जुड़ी है कि भाई इस दिन बहन को उपहार देता है।
मथुरा और यमुना स्नान
परंपरा है कि इस दिन भाई-बहन मिलकर यमुना में स्नान करें। मथुरा के विश्राम घाट पर भाई दूज के दिन भाई-बहनों के एक साथ स्नान की बड़ी पुरानी परंपरा है, और वहाँ यम-यमुना का मंदिर भी है। जो लोग नदी तक नहीं जा सकते, वे घर पर ही स्नान करके यमुना जी और यमराज को प्रणाम कर लेते हैं।
भाव का अर्थ: इस कथा में "यम का भय न सताना" डराने वाली बात नहीं, स्नेह का आशीर्वाद है — भाई-बहन का प्रेम जीवन को सुरक्षित और भरा-पूरा बनाता है।
कथा से सीख
- रिश्तों के लिए समय निकालें: यमराज जैसे व्यस्त देव ने भी अंत में बहन के लिए दिन निकाला। काम कभी ख़त्म नहीं होता, रिश्ते इंतज़ार करते हैं।
- निःस्वार्थ प्रेम: यमुना ने अपने लिए नहीं, सभी भाई-बहनों के लिए वर माँगा।
- प्रेम कठोरता को भी जीत लेता है: जिनसे सब डरते हैं, वे भी बहन के स्नेह के आगे कोमल हो गए।
- आदर-सत्कार: घर आए अतिथि, और ख़ासकर अपनों का, मन से स्वागत करना हमारी संस्कृति की सुंदरता है।
परिवार के लिए
इस भाई दूज, अगर बहन दूर है तो कम से कम एक फ़ोन या वीडियो कॉल ज़रूर करें। और बच्चों को यह कथा सुनाकर पूछिए — यमुना ने अपने लिए कुछ क्यों नहीं माँगा?
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