ध्रुव की कथा — पाँच साल के बालक की तपस्या और ध्रुव तारा
सौतेली माँ के कड़वे शब्दों से आहत नन्हे ध्रुव ने भगवान को पाने का संकल्प लिया और अटल ध्रुव तारा बन गया।
इस लेख में
रात को उत्तर दिशा में एक तारा दिखता है जो अपनी जगह से हिलता नहीं — ध्रुव तारा। उसके पीछे एक छोटे से बच्चे की बड़ी कथा है। यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण (चौथा स्कंध, अध्याय 8–12) और विष्णु पुराण में मिलती है।
कथा
पिता की गोद
स्वायंभुव मनु के पुत्र राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं — सुनीति और सुरुचि। सुनीति के पुत्र थे ध्रुव, और सुरुचि के पुत्र थे उत्तम। राजा छोटी रानी सुरुचि को अधिक प्रेम करते थे।
एक दिन राजा उत्तम को गोद में बिठाकर दुलार कर रहे थे। पाँच साल का ध्रुव भी दौड़कर आया और पिता की गोद में बैठना चाहा। पर रानी सुरुचि के डर से राजा ने उसे नहीं उठाया।
सुरुचि ने घमंड से कहा — "तुम राजा के पुत्र तो हो, पर मेरे गर्भ से नहीं जन्मे, इसलिए इस गोद और सिंहासन के अधिकारी नहीं हो। अगर यहाँ बैठना है तो भगवान की तपस्या करो और अगले जन्म में मेरे पुत्र बनकर आओ।"
ये कड़वे शब्द नन्हे ध्रुव के मन में तीर की तरह लगे। पिता चुप रहे। ध्रुव रोता हुआ अपनी माँ के पास पहुँचा।
माँ की सीख
माँ सुनीति ने सब सुना। उनका भी दिल दुखा, पर उन्होंने बेटे को क्रोध या बदला नहीं सिखाया। उन्होंने कहा — "बेटा, किसी का बुरा मत सोचो। तुम्हारी विमाता ने एक बात सच कही है — जो सचमुच ऊँचा स्थान चाहता है, उसे भगवान की शरण लेनी चाहिए। उन्हीं कमलनयन भगवान की आराधना करो, जो हर दुखी का सहारा हैं।"
ध्रुव ने उसी क्षण निश्चय किया और घर छोड़कर वन की ओर चल पड़ा।
नारद जी की परीक्षा
रास्ते में देवर्षि नारद मिले। उन्होंने ध्रुव की परीक्षा ली — "बेटा, तुम अभी बहुत छोटे हो। तपस्या बड़ी कठिन होती है, बड़े-बड़े ऋषि भी नहीं कर पाते। घर लौट जाओ, बड़े होकर यह सब करना।"
पर ध्रुव अडिग रहा — "मुनिवर, मेरा मन टूट गया है। मुझे ऐसा स्थान चाहिए जो मेरे पिता-दादा को भी न मिला हो। आप बस मुझे राह बताइए।"
नारद जी उसकी दृढ़ता देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे यमुना किनारे मधुवन (आज के मथुरा के पास) जाने को कहा, भगवान के ध्यान की विधि बताई और यह द्वादशाक्षर (बारह अक्षरों का) मंत्र दिया:
कठोर तपस्या
मधुवन में ध्रुव ने तप शुरू किया। पहले महीने वह हर तीसरे दिन कुछ फल-बेर खाता, दूसरे महीने हर छठे दिन सूखी पत्तियाँ, तीसरे महीने हर नौवें दिन केवल जल, और चौथे महीने हर बारहवें दिन केवल हवा। पाँचवें महीने वह साँस रोककर एक पैर पर खड़ा होकर भगवान के ध्यान में डूब गया।
उसका ध्यान इतना गहरा था कि जब उसने साँस रोकी, तो पूरे संसार के प्राणियों की साँस घुटने लगी। घबराए देवता भगवान विष्णु के पास पहुँचे। भगवान बोले — "डरो मत, मैं अपने भक्त को अभी इस तप से मुक्त करता हूँ।"
भगवान के दर्शन
भगवान गरुड़ पर सवार होकर मधुवन आए। ध्रुव ध्यान में जिस रूप को देख रहा था, वह अचानक मन से ओझल हो गया। घबराकर उसने आँखें खोलीं तो वही रूप सामने खड़ा था!
ध्रुव भगवान के चरणों में गिर पड़ा। वह स्तुति करना चाहता था, पर छोटा बच्चा क्या बोले? तब भगवान ने अपने शंख से प्रेमपूर्वक उसके गाल को छुआ, और उसी क्षण उसकी वाणी खुल गई। ध्रुव ने भगवान की अत्यंत सुंदर स्तुति की।
भगवान ने वर दिया — "तुम लंबे समय तक धर्म से राज्य करोगे, और उसके बाद तुम्हें वह अटल धाम मिलेगा जो प्रलय में भी नष्ट नहीं होता, जिसके चारों ओर ग्रह-नक्षत्र और सप्तर्षि घूमते हैं। वह ध्रुवलोक कहलाएगा।"
जो माँगा, उस पर पछतावा
घर लौटते हुए ध्रुव के मन में एक पछतावा था — "मुझे स्वयं भगवान मिले और मैंने उनसे राज्य माँगा! यह तो ऐसा हुआ जैसे कोई चक्रवर्ती सम्राट से टूटे चावल के दाने माँग ले।" यही सच्चे भक्त की पहचान है — भगवान के दर्शन के बाद संसार की चीज़ें छोटी लगने लगती हैं।
उधर राजा उत्तानपाद को अपनी गलती का बहुत पछतावा था। ध्रुव के लौटने की ख़बर सुनकर वे स्वयं नगर से बाहर स्वागत करने आए और बेटे को गले लगा लिया। दोनों माताओं ने भी उसका स्वागत किया। बाद में राजा ने ध्रुव को राज्य सौंपकर वन की राह ली, और ध्रुव ने बहुत लंबे समय तक प्रजा का पालन किया। अंत में वे ध्रुवलोक गए, जिसे आज हम आकाश में ध्रुव तारे के रूप में देखते हैं।
एक बात: भागवत में आगे एक प्रसंग है कि यक्षों द्वारा भाई उत्तम के मारे जाने पर ध्रुव ने क्रोध में यक्षों से युद्ध किया, और दादा स्वायंभुव मनु ने उन्हें समझाकर क्रोध शांत करवाया। महान भक्त को भी क्रोध पर काबू सीखना पड़ता है।
कथा से सीख
- अपमान को संकल्प में बदलो: ध्रुव ने कड़वे शब्दों का बदला नहीं लिया, उन्हें आगे बढ़ने की ताकत बना लिया।
- माँ की सीख: सुनीति ने बेटे के मन में ज़हर नहीं, विश्वास भरा। बच्चों की दिशा ऐसे ही बनती है।
- दृढ़ता उम्र नहीं देखती: पाँच साल का बालक वह कर गया जो बड़े नहीं कर पाते।
- अटल रहो: जैसे ध्रुव तारा अपनी जगह नहीं छोड़ता, वैसे ही सच्चे रास्ते पर टिके रहना चाहिए।
परिवार के लिए
आज रात बच्चों को छत पर ले जाकर उत्तर दिशा में ध्रुव तारा दिखाइए (सप्तर्षि मंडल के दो तारों की सीध में) और यह कथा सुनाइए।
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