समुद्र मंथन की कथा — चौदह रत्न, माँ लक्ष्मी और नीलकंठ महादेव
देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर मथा — विष निकला, रत्न निकले, माँ लक्ष्मी प्रकट हुईं और अमृत का बँटवारा हुआ।
दीपावली पर हम जिन माँ लक्ष्मी की पूजा करते हैं, वे कहाँ से प्रकट हुईं? धनतेरस पर जिन भगवान धन्वंतरि को याद करते हैं, वे कौन हैं? और शिव जी को "नीलकंठ" क्यों कहते हैं? इन सबका उत्तर एक ही कथा में है — समुद्र मंथन। यह कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत पुराण (आठवाँ स्कंध) और विष्णु पुराण में मिलती है।
कथा
स्वर्ग से लक्ष्मी का चले जाना
विष्णु पुराण के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को प्रसाद रूप में एक दिव्य माला दी। इंद्र ने अभिमान में वह माला अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर डाल दी, और ऐरावत ने उसे सूँड़ से नीचे फेंककर पैरों से कुचल दिया। दुर्वासा ने इसे अपमान माना और शाप दिया कि इंद्र की श्री (लक्ष्मी, वैभव) चली जाएगी।
ऐसा ही हुआ। देवता शक्तिहीन हो गए और असुरों से हारने लगे। दुखी देवता ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु की शरण में गए।
विष्णु की युक्ति
भगवान विष्णु ने कहा — "क्षीरसागर को मथो। उसमें से अमृत निकलेगा, जिसे पीकर तुम फिर शक्तिशाली हो जाओगे। पर यह काम अकेले तुमसे नहीं होगा। अभी असुरों से संधि कर लो और उन्हें भी साथ ले लो।"
देवताओं ने असुरों के राजा बलि से बात की। अमृत के लालच में असुर भी तैयार हो गए। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और नागराज वासुकि को रस्सी। असुरों ने वासुकि का मुख वाला भाग पकड़ा और देवताओं ने पूँछ वाला।
कच्छप अवतार
मंथन शुरू हुआ, पर भारी मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा, क्योंकि उसके नीचे कोई आधार नहीं था। तब भगवान विष्णु ने विशाल कच्छप (कछुए) का रूप लिया और पर्वत को अपनी पीठ पर उठा लिया। यह भगवान का कूर्म अवतार कहलाता है (दशावतार में दूसरा)।
हलाहल और नीलकंठ
मंथन से सबसे पहले जो निकला, वह था भयंकर विष — हलाहल। उसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। देवता, असुर, सब घबराकर भगवान शिव के पास पहुँचे।
करुणामय शिव ने संसार की रक्षा के लिए वह विष अपनी हथेली में लेकर पी लिया। पर उन्होंने उसे गले से नीचे नहीं उतरने दिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, और तभी से वे नीलकंठ कहलाए। (कुछ कथाओं में माता पार्वती द्वारा उनका कंठ थामने का प्रसंग भी आता है।)
चौदह रत्न
इसके बाद मंथन से एक-एक कर अद्भुत वस्तुएँ निकलीं, जिन्हें "चौदह रत्न" कहा जाता है। अलग-अलग ग्रंथों में सूची और क्रम थोड़ा बदलता है; प्रचलित सूची यह है:
- हलाहल विष — जिसे शिव ने धारण किया
- कामधेनु गाय — जिसे ऋषियों ने यज्ञ के लिए लिया
- उच्चैःश्रवा घोड़ा — सफ़ेद, सात मुख वाला, जो बलि ने लिया
- ऐरावत हाथी — जो इंद्र को मिला
- कौस्तुभ मणि — जिसे भगवान विष्णु ने हृदय पर धारण किया
- कल्पवृक्ष (पारिजात) — जो स्वर्ग में गया
- अप्सराएँ (जैसे रंभा)
- माँ लक्ष्मी
- वारुणी (मदिरा) — जिसे असुरों ने लिया
- चंद्रमा — जिसे शिव ने मस्तक पर धारण किया
- पाञ्चजन्य शंख
- शार्ङ्ग धनुष
- भगवान धन्वंतरि — आयुर्वेद के देवता
- अमृत — जो धन्वंतरि अपने हाथ के कलश में लेकर निकले
माँ लक्ष्मी का प्रकट होना
इस कथा का सबसे सुंदर क्षण तब आया जब कमल पर विराजमान, हाथ में कमल लिए माँ लक्ष्मी प्रकट हुईं। उनके तेज से दिशाएँ जगमगा उठीं। देवताओं ने उनकी स्तुति की, गंगा आदि नदियों ने स्नान के लिए जल दिया, और दिग्गजों ने उनका अभिषेक किया।
माँ लक्ष्मी ने सबको देखा — कोई क्रोधी था, कोई अभिमानी, कोई तपस्वी पर रूखा। अंत में उन्होंने भगवान विष्णु को चुना, जो सब गुणों से भरे थे पर किसी चीज़ के लोभी नहीं थे, और उनके गले में वरमाला डाल दी। लक्ष्मी के लौटते ही देवताओं का खोया वैभव लौट आया। इसीलिए दीपावली पर लक्ष्मी-पूजा होती है। माँ के बारे में और पढ़ें: माँ लक्ष्मी — परिचय, स्वरूप का अर्थ, अष्टलक्ष्मी, कथाएँ और मंदिर।
धन्वंतरि और अमृत
अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत का कलश लेकर निकले। मान्यता है कि वे कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रकट हुए, इसीलिए उस दिन धनतेरस मनाई जाती है और उसे धन्वंतरि जयंती भी कहते हैं।
मोहिनी अवतार
अमृत देखते ही असुरों ने कलश छीन लिया और आपस में ही झगड़ने लगे। तब भगवान विष्णु ने एक अत्यंत सुंदर स्त्री मोहिनी का रूप लिया। असुर उन पर मोहित हो गए और बोले — "तुम ही इसे बाँट दो।"
मोहिनी ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाया और अमृत देवताओं को पिलाना शुरू किया। एक असुर, स्वर्भानु, वेश बदलकर देवताओं की पंक्ति में सूर्य और चंद्रमा के बीच जा बैठा। उसने अमृत पी लिया, पर सूर्य-चंद्र ने उसे पहचान लिया। भगवान ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर अलग कर दिया। अमृत पी लेने से वह मरा नहीं — सिर राहु और धड़ केतु कहलाया।
अमृत पीकर देवता फिर शक्तिशाली हुए और असुरों पर विजय पाई।
कथा से सीख
- पहले विष, फिर अमृत: जीवन में किसी बड़े काम की शुरुआत में कठिनाइयाँ ही पहले आती हैं। धैर्य से मंथन चलता रहे तो अमृत भी मिलता है।
- दूसरों के लिए दुख सहना: शिव ने सबका विष स्वयं पी लिया। बड़ा वही है जो दूसरों का दुख अपने ऊपर ले ले।
- लक्ष्मी अभिमान से दूर रहती हैं: इंद्र के अभिमान से श्री गई और विनम्र, संतुलित विष्णु को लक्ष्मी ने चुना।
- मिलकर काम: जो काम अकेले असंभव था, वह सबके साथ आने से संभव हुआ।
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