भक्त प्रह्लाद की कथा — हिरण्यकशिपु और भगवान नृसिंह
एक नन्हे बालक की अटूट भक्ति, अहंकारी पिता के अत्याचार और खंभे से प्रकट हुए भगवान नृसिंह की कथा।
सनातन परंपरा में जब भी सच्ची, निडर भक्ति की बात होती है, सबसे पहला नाम आता है — भक्त प्रह्लाद। यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के सातवें स्कंध में विस्तार से मिलती है, और विष्णु पुराण में भी।
कथा
अहंकारी राजा
दैत्यराज हिरण्यकशिपु का छोटा भाई हिरण्याक्ष भगवान विष्णु के वराह अवतार के हाथों मारा गया था। तभी से हिरण्यकशिपु विष्णु से घोर शत्रुता रखने लगा।
उसने अमर होने के लिए मंदराचल पर्वत पर बहुत कठोर तप किया। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए, पर अमरता का वर उन्होंने नहीं दिया। तब हिरण्यकशिपु ने चतुराई से वर माँगा — "मुझे आपके बनाए किसी प्राणी से मृत्यु न हो; न मनुष्य मारे, न पशु; न घर के भीतर मरूँ, न बाहर; न दिन में, न रात में; न धरती पर, न आकाश में; और न किसी अस्त्र-शस्त्र से।"
वर पाकर वह स्वयं को भगवान मानने लगा। उसने तीनों लोकों को जीत लिया और आदेश दिया कि कोई विष्णु का नाम न ले, सब केवल उसकी पूजा करें।
माँ की गोद में भक्ति
जब हिरण्यकशिपु तप करने गया था, तब उसकी गर्भवती पत्नी कयाधु को देवर्षि नारद ने अपने आश्रम में आश्रय दिया था। नारद जी कयाधु को भगवान की भक्ति की बातें सुनाते, और गर्भ में पल रहा शिशु भी उन्हें सुनता रहा। वही शिशु था — प्रह्लाद। जन्म से ही उसके मन में भगवान के लिए प्रेम भरा था।
गुरुकुल में प्रह्लाद
बड़ा होने पर प्रह्लाद को दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पुत्रों षण्ड और अमर्क के पास पढ़ने भेजा गया। गुरु उसे राजनीति और दैत्यों की श्रेष्ठता सिखाते, पर प्रह्लाद अवसर मिलते ही अपने सहपाठियों को भगवान की भक्ति के बारे में बताने लगता — "मित्रों, यह मनुष्य जीवन बहुत कीमती है, इसे भगवान को याद करने में लगाओ।"
एक दिन पिता ने प्रेम से उसे गोद में बिठाकर पूछा — "बेटा, तुमने अब तक जो सबसे अच्छी बात सीखी हो, वह सुनाओ।" प्रह्लाद ने भक्ति के नौ रूप बताए — भगवान की कथा सुनना, उनका गुणगान करना, उन्हें याद करना, उनकी सेवा, पूजा, वंदना, उन्हें अपना स्वामी मानना, उन्हें मित्र मानना, और स्वयं को पूरी तरह उन्हें सौंप देना। भागवत का यह श्लोक "नवधा भक्ति" के नाम से प्रसिद्ध है:
यह सुनते ही हिरण्यकशिपु आग-बबूला हो गया। उसने बच्चे को गोद से धक्का दे दिया।
अत्याचार, पर अटूट विश्वास
अब हिरण्यकशिपु ने अपने ही बेटे को मारने के उपाय शुरू किए। दैत्यों ने शस्त्रों से वार किए, पागल हाथियों से कुचलवाने की कोशिश हुई, ज़हरीले साँप छोड़े गए, भोजन में विष दिया गया, ऊँचे पर्वत से नीचे फेंका गया, आग में डाला गया। पर हर बार प्रह्लाद भगवान का नाम लेता रहा और हर बार सुरक्षित बच गया। उसके मन में पिता के प्रति भी द्वेष नहीं आया।
होलिका की कथा: होलिका की गोद में बैठकर आग से प्रह्लाद के बचने की प्रसिद्ध कथा भागवत पुराण में नहीं, बल्कि बाद के ग्रंथों और लोक परंपरा में मिलती है। होली के पर्व पर इसे ही याद किया जाता है।
"कहाँ है तेरा भगवान?"
अंत में क्रोध से काँपते हिरण्यकशिपु ने चिल्लाकर पूछा — "मूर्ख! किसके बल पर तू मेरी आज्ञा नहीं मानता? कहाँ है तेरा भगवान?"
प्रह्लाद ने शांत स्वर में कहा — "पिताजी, वे सब जगह हैं, आपमें भी, मुझमें भी।"
"तो क्या इस खंभे में भी है?" — हिरण्यकशिपु ने सभा के एक खंभे की ओर इशारा किया।
"हाँ, इसमें भी हैं।"
नृसिंह का प्रकट होना
हिरण्यकशिपु ने तलवार उठाई और पूरी ताकत से खंभे पर मुट्ठी से प्रहार किया। उसी क्षण एक भयंकर गर्जना हुई और खंभा फाड़कर भगवान नृसिंह प्रकट हुए — आधा शरीर मनुष्य का, आधा सिंह का; न पूरे मनुष्य, न पूरे पशु।
भगवान ने ब्रह्मा जी के हर वचन का मान रखा। उन्होंने हिरण्यकशिपु को पकड़ा और संध्या के समय (न दिन, न रात), महल की देहली पर (न भीतर, न बाहर), अपनी गोद (जंघाओं) पर रखकर (न धरती, न आकाश), अपने नखों से (न अस्त्र, न शस्त्र) उसका अंत कर दिया।
बालक ने भगवान को शांत किया
भगवान का क्रोध इतना प्रचंड था कि देवता और स्वयं माता लक्ष्मी भी पास जाने से डर रहे थे। तब ब्रह्मा जी ने प्रह्लाद को आगे भेजा। नन्हा प्रह्लाद बिना डरे भगवान के चरणों में लेट गया। भगवान ने प्रेम से उसके सिर पर हाथ रखा और उनका क्रोध शांत हो गया।
भगवान ने वर माँगने को कहा। प्रह्लाद बोला — "प्रभु, जो कुछ पाने की इच्छा से भक्ति करे, वह भक्त नहीं, व्यापारी है। मुझे बस यह वर दीजिए कि मेरे मन में कोई कामना ही न उठे।" फिर उसने अपने पिता के कल्याण की प्रार्थना की। भगवान ने बताया कि ऐसे भक्त के कारण उसके पूरे कुल का उद्धार हो गया। बाद में प्रह्लाद धर्म से राज्य करने वाले महान राजा बने।
भगवान नृसिंह का प्राकट्य दिवस नृसिंह जयंती (वैशाख शुक्ल चतुर्दशी) के रूप में मनाया जाता है। दशावतार में नृसिंह चौथे अवतार हैं — पढ़ें भगवान विष्णु और दशावतार — दस अवतारों की सरल कथा।
कथा से सीख
- सच्चा विश्वास निडर बनाता है: एक बालक पूरे साम्राज्य के सामने अकेला खड़ा रहा।
- भगवान सब जगह हैं: खंभे में भी — यानी हर जीव, हर वस्तु में उसी का अंश देखो।
- अहंकार अपने ही बनाए जाल में फँसता है: हिरण्यकशिपु ने हर रास्ता बंद किया, पर भगवान ने बीच का रास्ता निकाल लिया।
- भक्ति बिना सौदे की: प्रह्लाद ने बदले में कुछ नहीं माँगा, और बुरा करने वाले पिता के लिए भी भला माँगा।
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