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ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ)

भगवान विष्णु (जगदीश) की सबसे लोकप्रिय आरती के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ और आरती करने का आसान तरीका।

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इस लेख में
  1. आरती के पूरे बोल
  2. सरल अर्थ
  3. इस आरती की खास बात
  4. आरती कैसे करें
  5. ध्यान रखने योग्य बातें

"ओम जय जगदीश हरे" शायद भारत के घरों में सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली आरती है। "जगदीश" का अर्थ है पूरे जगत के स्वामी, यानी भगवान विष्णु। फिर भी इसे लगभग हर पूजा के अंत में गाया जाता है, चाहे सत्यनारायण कथा हो, दीपावली हो या घर का कोई छोटा अनुष्ठान।

यह आरती लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी मानी जाती है। आम तौर पर इसकी रचना पंजाब के विद्वान पं. श्रद्धाराम शर्मा फिल्लौरी (19वीं सदी) से जोड़ी जाती है। इसकी भाषा सरल हिंदी है, इसलिए बच्चे भी इसे जल्दी याद कर लेते हैं।

आरती के पूरे बोल

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ॐ जय जगदीश हरे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ॐ जय जगदीश हरे॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।किस विधि मिलूँ दयामय, किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥ॐ जय जगदीश हरे॥
दीनबन्धु दुःखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ॐ जय जगदीश हरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ॐ जय जगदीश हरे॥
तन मन धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा।तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ॐ जय जगदीश हरे॥

अंतिम पद "तन मन धन सब है तेरा" बहुत से घरों में जोड़ा जाता है, पर हर पुरानी पुस्तक में नहीं मिलता। कुछ जगह अंत में "श्री जगदीश जी की आरती, जो कोई नर गावे…" वाला पद भी गाया जाता है।

सरल अर्थ

पहला पद: हे जगत के स्वामी, आपकी जय हो। जो लोग आपको सच्चे मन से याद करते हैं, उनकी परेशानियाँ आप पल भर में दूर कर देते हैं।

दूसरा पद: जो आपका ध्यान करता है, उसे उसकी मेहनत और भक्ति का फल मिलता है। मन का दुख घटता है, घर में सुख और खुशहाली आती है, और शरीर के कष्ट भी हल्के पड़ते हैं।

तीसरा पद: आप ही मेरे माता-पिता हैं। आपको छोड़कर मैं किसकी शरण में जाऊँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं उम्मीद रखूँ।

चौथा पद: आप पूर्ण परमात्मा हैं और हर दिल की बात जानते हैं। आप ही सबसे ऊँचे ब्रह्म हैं, सबके मालिक हैं।

पाँचवाँ पद: आप दया का समुद्र हैं और पूरे संसार का पालन करते हैं। मैं तो कमियों से भरा, नासमझ इंसान हूँ; मैं आपका सेवक हूँ और आप मेरे स्वामी हैं, इसलिए मुझ पर कृपा कीजिए।

छठा पद: आप एक हैं, इंद्रियों से दिखाई नहीं देते, फिर भी सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयालु, मैं कम समझ वाला किस तरह आप तक पहुँचूँ? यह विनम्र प्रश्न ही भक्ति की शुरुआत है।

सातवाँ पद: आप दुखियों के सच्चे मित्र हैं, दुख हरने वाले हैं, मेरे ठाकुर और रक्षक हैं। अपना हाथ बढ़ाइए और मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, मैं आपके द्वार पर आ पड़ा हूँ।

आठवाँ पद: मेरे मन से लालच और बुरी आदतें मिटा दीजिए, मेरी गलतियाँ क्षमा कीजिए। मेरी श्रद्धा और भक्ति बढ़ाइए और मुझे अच्छे लोगों की सेवा का अवसर दीजिए।

अंतिम पद: मेरा शरीर, मन और धन सब आपका ही दिया हुआ है। आपकी चीज़ आपको ही अर्पित कर रहा हूँ, इसमें मेरा अपना क्या लगा? यह पंक्ति अहंकार छोड़ने की सुंदर सीख है।

इस आरती की खास बात

इस आरती में कोई कठिन विधि या शर्त नहीं है। इसमें भक्त भगवान से धन-दौलत से ज़्यादा अच्छा मन माँगता है: बुरी आदतें मिटें, श्रद्धा बढ़े और सेवा का भाव आए। इसीलिए इसे किसी भी देवता की पूजा के बाद गाया जाता है।

आरती कैसे करें

यह आरती आम तौर पर पूजा के बिल्कुल अंत में, भोग लगाने के बाद गाई जाती है।

  • थाली में घी या तेल का दीपक (एक बत्ती या पाँच बत्ती, जैसा आपके घर में चलन हो), थोड़ा कपूर, फूल, अक्षत और जल रख लें।
  • साफ़ जगह पर बैठें या खड़े हों। बहुत से घरों में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पूजा करने का चलन है; अपने घर की परंपरा मानें।
  • थाली को घड़ी की सुई की दिशा में (दाहिनी ओर से) धीरे-धीरे घुमाएँ। एक प्रचलित तरीका है: चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे विग्रह के सामने सात बार। अलग-अलग परंपराओं में यह संख्या अलग हो सकती है, इसलिए इसे नियम नहीं, सहायक मार्गदर्शन समझें।
  • घंटी, शंख या ताली के साथ पूरा परिवार मिलकर गाए तो आरती का आनंद कई गुना हो जाता है।
  • आरती के बाद थाली सबके सामने ले जाएँ। दोनों हथेलियाँ दीपक की लौ के ऊपर घुमाकर आँखों और सिर से लगाएँ।

दीपक जलाते समय दुपट्टे, पर्दे और बच्चों का ध्यान रखें; आरती का भाव सबसे बड़ा है, दिखावा नहीं।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • आरती को धीरे और साफ़ उच्चारण से गाएँ; तेज़ भागने से भाव छूट जाता है।
  • बोल याद न हों तो फ़ोन या किताब से पढ़कर गाना भी पूरी तरह ठीक है।
  • दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा के बाद पहले लक्ष्मी जी की आरती और फिर यह आरती गाने का चलन बहुत से घरों में है।

आगे पढ़ें: ॐ जय लक्ष्मी माता — लक्ष्मी जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ), भगवान विष्णु और दशावतार — दस अवतारों की सरल कथा, घर पर रोज़ की सरल पूजा विधि — 10-15 मिनट में, क्रम से, आरती कुंजबिहारी की — श्रीकृष्ण की आरती (पूरे बोल और अर्थ)

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