माँ दुर्गा और नवदुर्गा — नौ रूप, नवरात्रि के नौ दिन, कथा और मंदिर
आदिशक्ति माँ दुर्गा का परिचय, सिंह और अस्त्रों का अर्थ, महिषासुर-वध की कथा, नवदुर्गा के नौ रूप दिन के क्रम से, त्योहार और प्रसिद्ध मंदिर।
इस लेख में
माँ दुर्गा आदिशक्ति हैं — वह शक्ति जिससे सारी सृष्टि चलती है। "दुर्गा" का अर्थ है वह जो दुर्गम (कठिन) संकटों से पार लगाए और जिन तक बुराई पहुँच न सके। वे माँ की तरह ममता भी देती हैं और बुराई के सामने सिंहवाहिनी योद्धा बनकर खड़ी भी होती हैं। शाक्त परंपरा में देवी ही परम ब्रह्म हैं, और पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, काली — सब उन्हीं के रूप माने जाते हैं।
प्रमुख नाम
दुर्गा, अम्बा (अम्बे), जगदम्बा, भवानी, गौरी, पार्वती, चंडिका, शेरावाली, महिषासुरमर्दिनी, कात्यायनी, कालिका और नारायणी। माँ की कथा का मुख्य ग्रंथ दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) है, जो मार्कण्डेय पुराण का भाग है और जिसमें 700 श्लोक हैं।
स्वरूप और प्रतीकों का अर्थ
माँ दुर्गा को प्रायः आठ या दस भुजाओं वाली, लाल वस्त्र पहने, सिंह पर सवार दिखाया जाता है। दुर्गा सप्तशती (अध्याय 2) के अनुसार सब देवताओं ने अपनी-अपनी शक्ति और अस्त्र देवी को दिए थे:
- सिंह (शेर) वाहन — साहस और शक्ति; और यह भी कि पशु-प्रवृत्ति (क्रोध, अहंकार) पर माँ सवार हैं, यानी उसे नियंत्रण में रखती हैं।
- त्रिशूल — शिव का दिया; तीन गुणों और तीन तरह के दुखों का नाश।
- चक्र — विष्णु का दिया; धर्म और समय का चक्र।
- शंख — वरुण का दिया; पवित्र नाद, बुराई को चेतावनी।
- धनुष-बाण — लक्ष्य पर एकाग्र ऊर्जा।
- तलवार — विवेक की धार, जो अज्ञान को काटे।
- कमल — इतनी शक्ति के बीच भी मन की पवित्रता।
- अभय/वरद मुद्रा — भक्तों को "डरो मत" का आश्वासन और आशीर्वाद।
- अनेक भुजाएँ — माँ हर दिशा में, एक साथ अपने बच्चों की रक्षा करती हैं।
मुख्य कथा — महिषासुर-वध (संक्षेप में)
दुर्गा सप्तशती के अनुसार असुर महिषासुर ने वरदान के बल पर देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। तब ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सब देवताओं के तेज से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र दिए और हिमालय ने सिंह। भयंकर युद्ध में महिषासुर बार-बार रूप बदलता रहा — भैंसा, सिंह, हाथी, मनुष्य — पर अंत में देवी ने उसका वध किया।
सप्तशती में दो और प्रसंग हैं: मधु-कैटभ का अंत (जिसमें देवी योगनिद्रा रूप में हैं) और शुंभ-निशुंभ तथा उनके सेनापतियों चंड-मुंड और रक्तबीज का वध, जिसमें देवी के काली (चामुंडा) रूप की कथा आती है।
नवदुर्गा — माँ के नौ रूप
नवरात्रि के नौ दिनों में माँ के नौ रूपों की पूजा होती है। इनका क्रम देवी कवच में दिया गया है, जो दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले पढ़ा जाता है:
पहला दिन (प्रतिपदा) — शैलपुत्री
पर्वतराज हिमालय की पुत्री। वाहन वृषभ (बैल); दाएँ हाथ में त्रिशूल, बाएँ में कमल। पूर्व जन्म में वे दक्ष की पुत्री सती थीं। इसी दिन घटस्थापना (कलश स्थापना) होती है।
दूसरा दिन (द्वितीया) — ब्रह्मचारिणी
शिव को पाने के लिए कठोर तप करती हुई पार्वती का रूप। दाएँ हाथ में जपमाला, बाएँ में कमंडल। यह रूप सिखाता है कि लक्ष्य के लिए धैर्य और तप चाहिए।
तीसरा दिन (तृतीया) — चंद्रघंटा
माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र। सिंह पर सवार, दस भुजाएँ, युद्ध के लिए तैयार पर भक्तों के लिए शांत और सौम्य।
चौथा दिन (चतुर्थी) — कूष्मांडा
मान्यता है कि अपनी मंद मुस्कान से इन्होंने ब्रह्मांड (अंड) की रचना की। आठ भुजाएँ होने से अष्टभुजा देवी भी कहलाती हैं; वाहन सिंह।
पाँचवाँ दिन (पंचमी) — स्कंदमाता
गोद में बालक स्कंद (कार्तिकेय) को लिए माँ का ममतामयी रूप। सिंह पर सवार, और कमल पर बैठी होने से पद्मासना भी कहलाती हैं।
छठा दिन (षष्ठी) — कात्यायनी
ऋषि कात्यायन के यहाँ प्रकट होने से यह नाम पड़ा; परंपरा में यही महिषासुर-मर्दिनी रूप है। भागवत पुराण में ब्रज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पाने के लिए कात्यायनी देवी का व्रत किया था। वाहन सिंह।
सातवाँ दिन (सप्तमी) — कालरात्रि
काले वर्ण का, बिखरे केशों वाला भयानक रूप, वाहन गर्दभ (गधा)। यह रूप बुराई के लिए भयंकर है पर भक्तों के लिए हमेशा शुभ फल देने वाला, इसलिए शुभंकरी भी कहलाता है।
आठवाँ दिन (अष्टमी) — महागौरी
अत्यंत गोरा, शांत और श्वेत वस्त्रों वाला रूप; वाहन वृषभ। अष्टमी पर बहुत घरों में कन्या पूजन होता है।
नौवाँ दिन (नवमी) — सिद्धिदात्री
सब सिद्धियाँ देने वाली माँ, कमल पर विराजमान, चार भुजाएँ, वाहन सिंह। नवमी पर हवन और कन्या पूजन के साथ नवरात्रि पूरी होती है।
नवरात्रि में किस दिन कौन-सा रंग या भोग चढ़े, यह अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराओं में अलग है। ऊपर दिया नौ रूपों का क्रम सब जगह एक जैसा है।
मुख्य त्योहार
- शारदीय नवरात्रि — आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी; इसके बाद विजयादशमी (दशहरा)।
- दुर्गा पूजा — बंगाल, ओडिशा, असम आदि में षष्ठी से दशमी तक भव्य उत्सव।
- चैत्र नवरात्रि — चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी (राम नवमी)।
- गुप्त नवरात्रि — माघ और आषाढ़ में, साधकों में प्रचलित।
मंत्र और आरती
- जय अम्बे गौरी — आरती
- सबसे प्रसिद्ध स्तुति (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11):
सरल अर्थ: हे सब मंगलों में भी मंगल करने वाली, कल्याणमयी, सब कामों को पूरा करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी नारायणी — आपको नमस्कार है।
- "या देवी सर्वभूतेषु…" के श्लोक सप्तशती के पाँचवें अध्याय में हैं; लक्ष्मी रूप वाला श्लोक अर्थ सहित यहाँ पढ़ें: दिवाली पूजा के मंत्र — लक्ष्मी-गणेश मंत्र अर्थ सहित।
भारत के प्रसिद्ध देवी मंदिर
- माता वैष्णो देवी — त्रिकूट पर्वत, कटरा, रियासी ज़िला (जम्मू-कश्मीर)।
- कामाख्या मंदिर — नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी (असम)।
- कालीघाट काली मंदिर — कोलकाता (पश्चिम बंगाल)।
- अंबाजी मंदिर — बनासकांठा ज़िला (गुजरात)।
- चामुंडेश्वरी मंदिर — चामुंडी पहाड़ी, मैसूरु (कर्नाटक)।
- ज्वालामुखी (ज्वाला जी) — कांगड़ा ज़िला (हिमाचल प्रदेश)।
- नैना देवी — बिलासपुर ज़िला (हिमाचल प्रदेश)।
- विंध्यवासिनी देवी — विंध्याचल, मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश)।
- मनसा देवी — हरिद्वार (उत्तराखंड)।
माँ से सीख
नवदुर्गा की यात्रा एक कन्या (शैलपुत्री) से तपस्विनी, माँ, योद्धा और अंत में सिद्धि देने वाली तक जाती है। यह हर स्त्री की शक्ति का सम्मान है और हर इंसान को याद दिलाती है कि भीतर की बुराई — क्रोध, आलस्य, अहंकार — से लड़ना ही असली नवरात्रि है।
आगे पढ़ें: जय अम्बे गौरी — माँ दुर्गा की आरती (पूरे बोल और अर्थ), भगवान शिव — परिचय, स्वरूप का अर्थ, 12 ज्योतिर्लिंग और प्रसिद्ध मंदिर, माँ लक्ष्मी — परिचय, स्वरूप का अर्थ, अष्टलक्ष्मी, कथाएँ और मंदिर, श्री गणेश — परिचय, नाम, स्वरूप का अर्थ, कथाएँ और प्रसिद्ध मंदिर