🔔 आरती-चालीसा

श्री लक्ष्मी चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ

"मातु लक्ष्मी करि कृपा" से शुरू होने वाली पूरी लक्ष्मी चालीसा: दोहा, सोरठा, सभी चौपाइयाँ, अंतिम दोहे, सरल अर्थ और दीपावली व शुक्रवार को पाठ का तरीका।

📖 १० मिनट पढ़ें
इस लेख में
  1. प्रारंभिक दोहा और सोरठा
  2. चौपाई 1 से 9: माँ से विनती
  3. चौपाई 10 से 16: समुद्र मंथन और अवतार
  4. चौपाई 17 से 31: पाठ और पूजा की महिमा
  5. चौपाई 32 से 39: भक्त की पुकार
  6. अंतिम दोहे
  7. पाठ-भेद
  8. कैसे पढ़ें
  9. ध्यान रखने योग्य बातें

श्री लक्ष्मी चालीसा माँ लक्ष्मी की प्रिय स्तुति है। दीपावली की रात लक्ष्मी पूजा में, धनतेरस पर, हर शुक्रवार को और शरद पूर्णिमा पर बहुत से घरों में इसका पाठ होता है। इसमें माँ के समुद्र मंथन से प्रकट होने, हर अवतार में भगवान विष्णु के साथ रहने और भक्तों पर दया करने की बातें सरल भाषा में गाई गई हैं।

अंतिम दोहे में रचनाकार का नाम आता है: "रामदास धरि ध्यान नित", इसलिए इसे रामदास जी की रचना माना जाता है।

इसमें शुरू में एक दोहा और एक सोरठा, फिर 39 चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं। पूरा पाठ लगभग 7 से 9 मिनट का है।

नीचे दिया पाठ कई भरोसेमंद स्रोतों से मिलाकर लिखा गया है। जहाँ पुस्तकों में शब्द या पंक्तियाँ अलग मिलती हैं, वे "पाठ-भेद" में दी गई हैं।

प्रारंभिक दोहा और सोरठा

मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूँ।सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदम्बिका॥

अर्थ: हे माता लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में बस जाइए, मेरी मनोकामना पूरी करके मेरी आशा पूरी कीजिए। हाथ जोड़कर मेरी यही विनती है: हे जगत की माता जगदम्बिका, हर तरह से मेरे घर और जीवन में अच्छा वास कीजिए। आपकी जय हो।

चौपाई 1 से 9: माँ से विनती

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥ 1तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥ 2

अर्थ: हे समुद्र की बेटी, मैं आपको याद करता हूँ; मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए। आपके जैसा उपकार करने वाला कोई नहीं; हर तरह से हमारी आशा पूरी कीजिए।

जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥ 3तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥ 4जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥ 5

अर्थ: हे जगत की माता जगदम्बा, आपकी जय हो; आप ही सबका सहारा हैं। आप हर प्राणी के हृदय में बसती हैं; हमारी यही ख़ास विनती है। हे जगत जननी, समुद्र की कन्या, आपकी जय हो; आप दीन-दुखियों का भला करती हैं।

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥ 6केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥ 7कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥ 8ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥ 9

अर्थ: हे महारानी, मैं रोज़ आपसे विनती करता हूँ; हे जग जननी भवानी, कृपा कीजिए। मैं आपकी स्तुति किस तरह करूँ? मेरे अपराध भुलाकर मेरी सुध लीजिए। मेरी ओर कृपा की नज़र से देखिए और मेरी विनती सुनिए। आप ज्ञान, बुद्धि, विजय और सुख देने वाली हैं; हे माता, हमारे संकट हर लीजिए।

चौपाई 10 से 16: समुद्र मंथन और अवतार

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥ 10चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥ 11जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥ 12

अर्थ: जब भगवान विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन करवाया, तो समुद्र से चौदह रत्न निकले। उन चौदह रत्नों में आप सुख की खान थीं, और आप प्रभु विष्णु की सेवा में लग गईं। प्रभु ने जब-जब, जहाँ भी जन्म लिया, आपने रूप बदलकर वहीं उनकी सेवा की। पूरी कथा: समुद्र मंथन।

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥ 13तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥ 14

अर्थ: जब स्वयं विष्णु ने मनुष्य का शरीर धरकर अयोध्या में (श्रीराम के रूप में) अवतार लिया, तब आप जनकपुर में (सीता जी के रूप में) प्रकट हुईं और पुलकित मन से उनकी सेवा की।

अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥ 15तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥ 16

अर्थ: सबके मन की जानने वाले प्रभु ने आपको अपनाया; आप संसार में प्रसिद्ध, तीनों लोकों की स्वामिनी हैं। आपके जैसी प्रबल शक्ति कोई दूसरी नहीं; आपकी महिमा का मैं कहाँ तक बखान करूँ।

चौपाई 17 से 31: पाठ और पूजा की महिमा

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वाञ्छित फल पाई॥ 17तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भाँति मनलाई॥ 18

अर्थ: जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है। (इसलिए) छल, कपट और चालाकी छोड़कर मन लगाकर तरह-तरह से आपकी पूजा करनी चाहिए।

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥ 19ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित पावै फल सोई॥ 20त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बन्धन हारिणी॥ 21

अर्थ: एक बात और समझाकर कहता हूँ: जो मन लगाकर यह पाठ करता है, उसे कोई कष्ट नहीं होता और वह मनचाहा फल पाता है, ऐसा भक्तों का विश्वास है। हे दुख दूर करने वाली माँ, रक्षा करो, आपकी जय हो; आप शरीर, मन और संसार, तीनों तरह के ताप और संसार के बंधन हरने वाली हैं।

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥ 22ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥ 23पुत्रहीन अरु सम्पति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥ 24

अर्थ: जो यह चालीसा पढ़ता-पढ़ाता है, ध्यान लगाकर सुनता-सुनाता है, चालीसा कहती है कि उसे रोग नहीं सताते और वह संतान व धन-संपत्ति पाता है। जिसके संतान न हो, जिसके पास धन न हो, जो देख-सुन न पाता हो, कोढ़ से पीड़ित हो या बहुत दीन हो,

विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥ 25पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥ 26सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥ 27

अर्थ: वह ब्राह्मण को बुलाकर पाठ कराए और मन में कोई शंका न लाए। चालीस दिन तक पाठ कराए, तो उस पर गौरीसा (गौरी के स्वामी, शिव जी) भी कृपा करते हैं। उसे बहुत सुख-संपत्ति मिलती है और किसी चीज़ की कमी नहीं रहती।

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥ 28प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥ 29बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥ 30करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥ 31

अर्थ: जो बारहों महीने आपकी पूजा करता है, उसके समान धन्य कोई दूसरा नहीं। जो रोज़ मन से पाठ करता है, उसके जैसा संसार में कोई नहीं। मैं तरह-तरह से क्या बड़ाई करूँ; ध्यान लगाकर ख़ुद परख लीजिए। जो विश्वास के साथ नियम और व्रत करता है, उसके काम सिद्ध होते हैं और हृदय में प्रेम जागता है।

चौपाई 32 से 39: भक्त की पुकार

जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥ 32तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥ 33मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥ 34

अर्थ: हे लक्ष्मी भवानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; आप सबमें बसी हैं और गुणों की खान हैं। संसार में आपका तेज सबसे प्रबल है; आपके जैसा दयालु कहीं कोई नहीं। मुझ अनाथ की अब सुध लीजिए, मेरे संकट काटकर मुझे भक्ति दीजिए।

भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥ 35बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥ 36नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥ 37

अर्थ: मेरी भूल-चूक क्षमा कीजिए और मेरी दशा देखकर मुझे दर्शन दीजिए। आपके दर्शन के बिना आपका यह भक्त व्याकुल है; आपके रहते हुए भी भारी दुख सह रहा है। मेरे भीतर न ज्ञान है न बुद्धि; आप तो सब अपने मन में जानती हैं।

रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥ 38केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥ 39

अर्थ: चार भुजाओं वाला रूप धारण करके अब मेरा कष्ट दूर कीजिए। मैं किस तरह आपकी बड़ाई करूँ, मेरे पास ज्ञान और बुद्धि ज़्यादा नहीं है।

अंतिम दोहे

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

अर्थ: हे दुख हरने वाली माँ, रक्षा करो, मेरे सारे डर और कष्ट जल्दी दूर करो। हे लक्ष्मी, आपकी जय हो, जय हो; मेरे शत्रुओं का नाश करो। रामदास रोज़ ध्यान लगाकर, हाथ जोड़कर विनती करते हैं: हे माता लक्ष्मी, अपने इस दास पर दया की नज़र डालिए।

पाठ-भेद

लक्ष्मी चालीसा के दो रूप सबसे ज़्यादा मिलते हैं। ऊपर वह पाठ है जो ज़्यादातर पुस्तकों और वेबसाइटों में मिलता है। दूसरे रूप में ये अंतर हैं:

  • शुरुआत में एक और सोरठा मिलता है: "सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार। ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥" (हे समुद्र की बेटी, विष्णु जी की प्रिया, ऋद्धि-सिद्धि और मंगल देने वाली माँ, मैं आपको बार-बार सिर झुकाता हूँ।)
  • चौपाई 39 के बाद एक और चौपाई मिलती है: "रामदास अब कहै पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥" (रामदास पुकारकर कहते हैं: माँ, हमारी विपत्ति दूर करो।)
  • चौपाई 3: "सबकी तुम ही हो अवलम्बा"; दूसरे रूप में "सबके तुमही हो स्वलम्बा"।
  • चौपाई 4: "तुम ही हो सब घट घट वासी"; दूसरे रूप में "तुम ही हो घट घट के वासी"।
  • चौपाई 16: "तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा…"; दूसरे रूप में "तुम सब प्रबल शक्ति… कहँ तक महिमा…"।
  • चौपाई 22: "जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै"; दूसरे रूप में "जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै"।
  • चौपाई 32: "जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी"; दूसरे रूप में "लक्ष्मी महारानी… व्यापित जो गुण खानी"।
  • छोटे अंतर: चौपाई 11 "प्रभु बनि दासी" / "प्रभुहिं बनि दासी"; चौपाई 15 "अपनायो" / "अपनाया"; अंतिम दोहा "करो शत्रु को नाश" / "करो शत्रुन का नाश"।
  • कई वेबसाइटों पर पहले दोहे में "परुवहु मेरी आस" और चौपाई 20 में "कष्ट नोई" छपा है; ये छपाई की गलतियाँ हैं, सही "पुरवहु" और "कष्ट न होई" है।

कैसे पढ़ें

  • दीपावली की रात लक्ष्मी पूजा के बाद, धनतेरस पर, हर शुक्रवार और शरद पूर्णिमा पर इसका पाठ ख़ास तौर पर होता है। रोज़ शाम दीया जलाते समय भी पढ़ सकते हैं।
  • घर साफ़ रखें, माँ लक्ष्मी और गणेश जी के चित्र के सामने घी या तेल का दीपक जलाएँ, कमल या कोई भी फूल चढ़ाएँ। ज़्यादा सामग्री ज़रूरी नहीं; साफ़ मन सबसे बड़ी तैयारी है।
  • माँ लक्ष्मी की पूजा में पहले गणेश जी को याद करने की परंपरा है, इसलिए कई लोग पहले गणेश चालीसा पढ़ते हैं।
  • पाठ के बाद लक्ष्मी जी की आरती "ॐ जय लक्ष्मी माता" गाई जा सकती है। मंत्र के लिए: दीपावली के लक्ष्मी-गणेश मंत्र।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • चालीसा में बताए फल (धन, संतान, रोग से मुक्ति) भक्तों की आस्था हैं, किसी चीज़ की गारंटी नहीं। माँ लक्ष्मी ईमानदार मेहनत, सफ़ाई और अच्छे व्यवहार वाले घर में बसती हैं,; पाठ के साथ यही सबसे सच्ची पूजा है।
  • चालीसा ख़ुद कहती है "तजि छल कपट और चतुराई", यानी धन की देवी की पूजा भी सच्चे मन से ही होती है।

आगे पढ़ें: माँ लक्ष्मी — परिचय, स्वरूप का अर्थ, अष्टलक्ष्मी, कथाएँ और मंदिर, ॐ जय लक्ष्मी माता — लक्ष्मी जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ), दीपावली लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि — सामग्री सूची और आसान स्टेप-बाय-स्टेप तरीका, दिवाली पूजा के मंत्र — लक्ष्मी-गणेश मंत्र अर्थ सहित, श्री गणेश चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ

यह भी पढ़ें

ॐ जय लक्ष्मी माता — लक्ष्मी जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)माँ लक्ष्मी की प्रसिद्ध आरती "ॐ जय लक्ष्मी माता" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ और दीपावली पूजा में इसे गाने का तरीका।माँ लक्ष्मी — परिचय, स्वरूप का अर्थ, अष्टलक्ष्मी, कथाएँ और मंदिरधन, समृद्धि और मंगल की देवी माँ लक्ष्मी कौन हैं, कमल-उल्लू जैसे प्रतीकों का अर्थ, अष्टलक्ष्मी, कथाएँ, त्योहार और प्रसिद्ध मंदिर।दीपावली लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि — सामग्री सूची और आसान स्टेप-बाय-स्टेप तरीकाघर पर दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा कैसे करें — पूरी सामग्री सूची, चौकी सजाने का तरीका और 12 आसान चरणों में पूजा विधि।दिवाली पूजा के मंत्र — लक्ष्मी-गणेश मंत्र अर्थ सहितदिवाली की लक्ष्मी-गणेश पूजा में बोले जाने वाले प्रमुख मंत्र — शुद्ध बोल, शब्दों का अर्थ, सरल भावार्थ और पूजा में कब बोलें।श्री गणेश चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ"जय गणपति सदगुण सदन" वाली पूरी गणेश चालीसा: दोहा, 38 चौपाइयाँ, अंतिम दोहे, गणेश जन्म की कथा वाले हिस्सों का सरल अर्थ और पाठ का तरीका।

आरती-चालीसा में और

ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ)भगवान विष्णु (जगदीश) की सबसे लोकप्रिय आरती के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ और आरती करने का आसान तरीका।जय गणेश जय गणेश देवा — गणेश जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)गणेश जी की सबसे लोकप्रिय आरती "जय गणेश जय गणेश देवा" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ, प्रचलित पाठभेद और आरती का तरीका।ॐ जय शिव ओंकारा — शिव जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)भगवान शिव की प्रसिद्ध आरती "ॐ जय शिव ओंकारा" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ, अतिरिक्त प्रचलित पद और आरती का तरीका।हनुमान चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थगोस्वामी तुलसीदास रचित पूरी हनुमान चालीसा (दोहे, 40 चौपाइयाँ और अंतिम दोहा), हर चौपाई का सरल अर्थ और पाठ करने का आसान तरीका।

श्रुति घर में सब आरती-चालीसा देखें →