🔔 आरती-चालीसा

श्री गणेश चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ

"जय गणपति सदगुण सदन" वाली पूरी गणेश चालीसा: दोहा, 38 चौपाइयाँ, अंतिम दोहे, गणेश जन्म की कथा वाले हिस्सों का सरल अर्थ और पाठ का तरीका।

📖 १० मिनट पढ़ें
इस लेख में
  1. प्रारंभिक दोहा
  2. चौपाई 1 से 8: गणेश जी का रूप
  3. चौपाई 9 से 19: गणेश जन्म की कथा
  4. चौपाई 20 से 30: शनि की दृष्टि और गजमुख
  5. चौपाई 31 से 38: परिक्रमा की कथा और विनती
  6. अंतिम दोहे
  7. पाठ-भेद
  8. कैसे पढ़ें
  9. ध्यान रखने योग्य बातें

श्री गणेश चालीसा गणपति जी की प्रिय स्तुति है। हर शुभ काम, बुधवार की पूजा, गणेश चतुर्थी और दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा में इसका पाठ होता है। इस चालीसा की ख़ास बात यह है कि इसके बीच में गणेश जी के जन्म की पूरी कथा और माता-पिता की परिक्रमा वाली कथा गाई गई है।

चौपाई 37 में रचनाकार का नाम आता है: "भजत रामसुन्दर प्रभुदासा"। इससे इसे रामसुन्दर जी की रचना माना जाता है; उनके बारे में इससे ज़्यादा पक्की जानकारी नहीं मिलती।

इसमें शुरू में एक दोहा, फिर 38 चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे हैं। पूरा पाठ लगभग 7 से 9 मिनट का है।

नीचे दिया पाठ कई भरोसेमंद स्रोतों से मिलाकर लिखा गया है। जहाँ पुस्तकों में शब्द अलग मिलते हैं, वे "पाठ-भेद" में दिए गए हैं।

प्रारंभिक दोहा

जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

अर्थ: हे गणपति, आपकी जय हो। आप सद्गुणों के घर हैं, आपका मुख सुंदर है और आप कृपालु हैं। आप विघ्न हरने वाले और मंगल करने वाले हैं; हे गिरिजा के लाल, आपकी जय हो, जय हो। (कुछ पुस्तकों में "कविवर बदन" की जगह "करिवर बदन" है, यानी श्रेष्ठ हाथी जैसे मुख वाले।)

चौपाई 1 से 8: गणेश जी का रूप

जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥ 1जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥ 2

अर्थ: हे गणों के राजा गणपति, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप हर शुभ काम को मंगल से भर देते हैं। हाथी जैसे मुख वाले, सुख के घर और सुख देने वाले, आप संसार के विनायक (विघ्नों के स्वामी) और बुद्धि के दाता हैं।

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥ 3राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥ 4पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥ 5

अर्थ: आपकी टेढ़ी सूँड़ पवित्र और सुंदर है, माथे पर त्रिपुंड तिलक मन को भाता है। छाती पर मणियों और मोतियों की माला है, सिर पर सोने का मुकुट और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। हाथों में पुस्तक, फरसा और त्रिशूल हैं; मोदक का भोग और सुगंधित फूल आपको प्रिय हैं।

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥ 6धनि शिव सुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥ 7ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥ 8

अर्थ: आपके शरीर पर सुंदर पीले वस्त्र हैं और पैरों में खड़ाऊँ; आपकी छवि मुनियों का मन भी मोह लेती है। आप धन्य हैं: शिव जी के पुत्र, कार्तिकेय के भाई और गौरी माँ के लाड़ले, जिनकी कीर्ति पूरे संसार में है। ऋद्धि और सिद्धि आप पर चँवर डुलाती हैं और द्वार पर आपका वाहन मूषक शोभा देता है।

चौपाई 9 से 19: गणेश जन्म की कथा

कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥ 9एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥ 10भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥ 11

अर्थ: अब मैं आपके जन्म की शुभ, पवित्र और मंगल करने वाली कथा कहता हूँ। एक बार पर्वतराज की बेटी पार्वती जी ने पुत्र पाने के लिए भारी तप और यज्ञ किया। जब वह अनोखा यज्ञ पूरा हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ पहुँचे।

अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥ 12अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥ 13मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥ 14

अर्थ: अतिथि आया जानकर गौरी जी बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने कई तरह से आपकी सेवा की। आपने प्रसन्न होकर वर दिया: "माता, पुत्र के लिए आपने जो तप किया है, उसके फल से आपको इसी समय, बिना गर्भ धारण किए, बड़ी बुद्धि वाला पुत्र मिलेगा।"

गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥ 15अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥ 16बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥ 17

अर्थ: "वह गणों का नायक, गुणों और ज्ञान का भंडार होगा और भगवान के रूप में सबसे पहले पूजा जाएगा।" ऐसा कहकर आप अदृश्य हो गए और पालने में बालक बनकर प्रकट हुए। जब आपने शिशु बनकर रोना शुरू किया, तो आपका मुख देखकर गौरी जी के सुख की कोई सीमा न रही।

सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥ 18शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं। सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥ 19

अर्थ: सब आनंद में डूबकर मंगल गीत गाने लगे और आकाश से देवता फूल बरसाने लगे। शिव जी और उमा (पार्वती) जी ने खूब दान लुटाया, और देवता, मुनि और लोग बालक को देखने आने लगे।

चौपाई 20 से 30: शनि की दृष्टि और गजमुख

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥ 20निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥ 21गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥ 22

अर्थ: इतना आनंद-उत्सव देखकर शनिदेव भी बालक को देखने आए। पर अपनी दृष्टि के दोष को याद करके वे मन ही मन बालक को देखना नहीं चाहते थे। इससे पार्वती जी के मन में थोड़ी खटास आई: "क्या मेरा यह उत्सव शनि को अच्छा नहीं लगा?"

कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥ 23नहिं विश्वास उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥ 24पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥ 25

अर्थ: शनिदेव सकुचाते हुए बोले: "बालक मुझे दिखाकर क्या करोगी?" पर उमा जी के मन में विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने शनि से बालक को देखने को कहा। शनि की दृष्टि पड़ते ही बालक का सिर उड़कर आकाश में चला गया।

गिरिजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥ 26हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥ 27

अर्थ: पार्वती जी व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुख का वर्णन नहीं हो सकता। कैलाश पर हाहाकार मच गया कि शनि के देखते ही बालक का नाश हो गया।

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये। काटि चक्र सो गज सिर लाये॥ 28बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥ 29नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥ 30

अर्थ: तब भगवान विष्णु तुरंत गरुड़ पर चढ़कर गए और चक्र से काटकर हाथी का सिर ले आए। उसे बालक के धड़ पर रखा गया और शंकर जी ने प्राण-मंत्र पढ़कर उसमें जीवन डाल दिया। तब शम्भु ने बालक का नाम "गणेश" रखा और वर दिया कि आप सबसे पहले पूजे जाएँगे और बुद्धि के भंडार होंगे। (यह कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण वाली परंपरा से मेल खाती है; शिव पुराण में गणेश जी के गजमुख होने की कथा अलग तरह से आती है।)

चौपाई 31 से 38: परिक्रमा की कथा और विनती

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥ 31चले षडानन भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥ 32चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥ 33

अर्थ: जब शिव जी ने दोनों पुत्रों की बुद्धि की परीक्षा ली और पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा, तो षडानन (कार्तिकेय) भ्रम में पड़कर निकल पड़े, पर आपने बैठकर बुद्धि से उपाय सोचा। आपने माता-पिता के चरण पकड़कर उन्हीं की सात परिक्रमा कर लीं। पूरी कथा: गणेश-कार्तिकेय परिक्रमा।

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥ 34तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥ 35

अर्थ: "धन्य हो गणेश!" कहकर शिव जी का हृदय खुशी से भर गया और आकाश से देवताओं ने खूब फूल बरसाए। आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई तो हज़ार मुख वाले शेषनाग भी पूरी नहीं गा सकते।

मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी॥ 36भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥ 37अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥ 38

अर्थ: मैं बुद्धि में कमज़ोर, मन से मैला और दुखी हूँ; आपकी विनती किस तरह करूँ? प्रभु का दास रामसुन्दर आपका भजन करता है; "जग प्रयाग ककरा दुर्वासा" में प्रयाग, ककरा और दुर्वासा, स्थानों या आश्रम के नाम लगते हैं, पर इस आधी पंक्ति का ठीक अर्थ पक्का नहीं है। हे प्रभु, अब इस दीन पर दया कीजिए और मुझे अपनी शक्ति और भक्ति दीजिए।

अंतिम दोहे

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै धर ध्यान।नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
संवत् अपन सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

अर्थ: जो ध्यान लगाकर यह श्री गणेश चालीसा पढ़ता है, उसके घर में रोज़ नए मंगल होते हैं और उसे संसार में सम्मान मिलता है। दूसरे दोहे में रचना पूरी होने का समय बताया गया है: ऋषि पंचमी के दिन, रविवार (दिनेश) को, मंगलमूर्ति गणेश जी की यह चालीसा पूरी हुई। "सम्वत अपन सहस्र दश" से कौन-सा वर्ष बताया गया है, यह साफ़ नहीं है।

पाठ-भेद

अलग-अलग पुस्तकों और वेबसाइटों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। ऊपर सबसे प्रचलित पाठ है; ये रूप भी गाए जाते हैं:

  • पहला दोहा: "कविवर बदन कृपाल"; एक पुराने संस्करण में "करिवर बदन कृपाल" (हाथी जैसे मुख वाले)।
  • चौपाई 1: "जय जय जय गणपति गणराजू"; कुछ में "जय जय जय गणपति राजू"। एक संस्करण में "मंगल भवन करण शुभ काजू" भी है।
  • चौपाई 7: "गौरी ललन विश्व-विख्याता"; कुछ में "विश्व-विधाता"।
  • चौपाई 8: "ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे"; कुछ में "चँवर डुलावे"।
  • चौपाई 24: "नहिं विश्वास उमा उर भयऊ"; कुछ में "उमा कर भयऊ"।
  • चौपाई 31: "पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा"; कुछ में "पृथ्वी की प्रदक्षिणा"।
  • चौपाई 32: "रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई"; कुछ में "रची बैठ"।
  • चौपाई 37: "जग प्रयाग ककरा दुर्वासा"; कुछ में "लख प्रयाग" या "लग प्रयाग"।
  • चौपाई 38: "अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै"; कुछ में "भक्ति शक्ति कछु दीजै"।
  • अंतिम दोहा: "पाठ करै धर ध्यान"; कुछ में "कर ध्यान"। कुछ वेबसाइटों पर "सम्वत अपन" की जगह "सम्बन्ध अपने" छपा है, जो नकल की गलती लगती है।

कैसे पढ़ें

  • बुधवार, हर महीने की चतुर्थी, गणेश चतुर्थी और दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा पर इसका पाठ ख़ास तौर पर होता है। कोई नया काम शुरू करने से पहले भी लोग इसे पढ़ते हैं।
  • स्नान के बाद गणेश जी के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक जलाएँ। दूर्वा, लाल फूल या एक लड्डू-मोदक हो तो चढ़ाएँ; न हो तो बस हाथ जोड़कर मन से याद करें।
  • शुरू में "ॐ गं गणपतये नमः" बोलें, फिर धीरे-धीरे पाठ करें। बीच में कथा वाला हिस्सा बच्चों को कहानी की तरह सुनाया जा सकता है।
  • पाठ के बाद गणेश जी की आरती "जय गणेश जय गणेश देवा" गाई जा सकती है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • चालीसा में बताए फल भक्तों की आस्था हैं, कोई गारंटी नहीं। गणेश जी बुद्धि के देवता हैं; पाठ के साथ सोच-समझकर मेहनत करना ही उनकी सच्ची पूजा है।
  • शनिदेव वाली कथा से डरने की कोई बात नहीं। कथा में शनि ख़ुद संकोच करते हैं, और अंत में सब मंगल ही होता है।

आगे पढ़ें: श्री गणेश — परिचय, नाम, स्वरूप का अर्थ, कथाएँ और प्रसिद्ध मंदिर, जय गणेश जय गणेश देवा — गणेश जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ), गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा — माता-पिता में ही संसार, दिवाली पूजा के मंत्र — लक्ष्मी-गणेश मंत्र अर्थ सहित, श्री लक्ष्मी चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ

यह भी पढ़ें

जय गणेश जय गणेश देवा — गणेश जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)गणेश जी की सबसे लोकप्रिय आरती "जय गणेश जय गणेश देवा" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ, प्रचलित पाठभेद और आरती का तरीका।श्री गणेश — परिचय, नाम, स्वरूप का अर्थ, कथाएँ और प्रसिद्ध मंदिरप्रथम पूज्य श्री गणेश कौन हैं, उनके प्रमुख नाम, सूँड़-मूषक-मोदक जैसे प्रतीकों का अर्थ, मुख्य कथाएँ, त्योहार और प्रसिद्ध मंदिर।गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा — माता-पिता में ही संसारपूरी पृथ्वी की परिक्रमा की होड़ में गणेश जी ने माता-पिता के चारों ओर चक्कर लगाकर कैसे जीत पाई — पौराणिक परंपरा की प्यारी कथा।दिवाली पूजा के मंत्र — लक्ष्मी-गणेश मंत्र अर्थ सहितदिवाली की लक्ष्मी-गणेश पूजा में बोले जाने वाले प्रमुख मंत्र — शुद्ध बोल, शब्दों का अर्थ, सरल भावार्थ और पूजा में कब बोलें।श्री लक्ष्मी चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थ"मातु लक्ष्मी करि कृपा" से शुरू होने वाली पूरी लक्ष्मी चालीसा: दोहा, सोरठा, सभी चौपाइयाँ, अंतिम दोहे, सरल अर्थ और दीपावली व शुक्रवार को पाठ का तरीका।

आरती-चालीसा में और

ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ)भगवान विष्णु (जगदीश) की सबसे लोकप्रिय आरती के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ और आरती करने का आसान तरीका।ॐ जय लक्ष्मी माता — लक्ष्मी जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)माँ लक्ष्मी की प्रसिद्ध आरती "ॐ जय लक्ष्मी माता" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ और दीपावली पूजा में इसे गाने का तरीका।ॐ जय शिव ओंकारा — शिव जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)भगवान शिव की प्रसिद्ध आरती "ॐ जय शिव ओंकारा" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ, अतिरिक्त प्रचलित पद और आरती का तरीका।हनुमान चालीसा — पूरा पाठ और सरल अर्थगोस्वामी तुलसीदास रचित पूरी हनुमान चालीसा (दोहे, 40 चौपाइयाँ और अंतिम दोहा), हर चौपाई का सरल अर्थ और पाठ करने का आसान तरीका।

श्रुति घर में सब आरती-चालीसा देखें →