गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा — माता-पिता में ही संसार
पूरी पृथ्वी की परिक्रमा की होड़ में गणेश जी ने माता-पिता के चारों ओर चक्कर लगाकर कैसे जीत पाई — पौराणिक परंपरा की प्यारी कथा।
बच्चों को सुनाई जाने वाली सबसे प्यारी कथाओं में से एक है — गणेश जी और उनके बड़े भाई कार्तिकेय की परिक्रमा की होड़। यह कथा पौराणिक परंपरा और लोक-कथाओं में बहुत प्रसिद्ध है। शिव पुराण (रुद्र संहिता, कुमार खंड) में इसका एक रूप मिलता है, और दूसरे रूप लोक-परंपरा और बाद की पौराणिक कथाओं में पीढ़ियों से सुनाए जाते हैं।
कथा के दो प्रचलित रूप हैं। शिव पुराण में यह होड़ इस बात पर है कि दोनों भाइयों में पहले किसका विवाह हो। लोक-परंपरा में, खासकर दक्षिण भारत में, होड़ एक दिव्य फल (ज्ञान-फल) के लिए बताई जाती है। दोनों का सार एक ही है। यहाँ हम फल वाला लोकप्रिय रूप सुनाते हैं और अंत में दूसरा रूप भी बताते हैं।
कथा
एक अनोखा फल
कैलाश पर्वत पर भगवान शिव, माता पार्वती और उनके दोनों पुत्र — कार्तिकेय और गणेश — आनंद से रहते थे। कार्तिकेय फुर्तीले योद्धा थे, जिनका वाहन तेज़ उड़ने वाला मोर था। गणेश जी बुद्धिमान और शांत थे, और उनका वाहन था छोटा-सा मूषक (चूहा)।
एक दिन देवर्षि नारद कैलाश आए। उनके हाथ में एक अनोखा फल था। उन्होंने शिव जी को फल भेंट करते हुए कहा — "प्रभु, यह ज्ञान का फल है। पर इसे पूरा का पूरा एक ही व्यक्ति को खाना चाहिए, बाँटकर नहीं।"
अब मुश्किल हो गई। दोनों बेटे फल चाहते थे। माता-पिता किसे दें?
होड़ की शर्त
शिव जी ने मुस्कुराकर कहा — "जो पूरे संसार (पृथ्वी) की परिक्रमा करके सबसे पहले लौटेगा, फल उसी का होगा।"
यह सुनते ही कार्तिकेय उत्साह से भर गए। उन्होंने सोचा — "मेरा मोर तो हवा से बातें करता है, और भैया का चूहा तो धीरे-धीरे चलता है। जीत तो मेरी ही होगी!" वे बिना एक पल गँवाए मोर पर बैठे और आकाश में उड़ चले — पहाड़, नदियाँ, समुद्र, वन, सब पार करते हुए।
गणेश जी की सूझ
गणेश जी वहीं खड़े रहे। उन्होंने अपने मूषक को देखा और सोचा — "इस पर बैठकर तो मैं पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कभी पूरी नहीं कर पाऊँगा। पर संसार है क्या?"
फिर उन्होंने आँखें बंद करके थोड़ा सोचा, और मुस्कुरा दिए। वे माता-पिता के पास गए और हाथ जोड़कर बोले — "माँ, पिताजी, कृपया एक साथ यहाँ बैठ जाइए।"
शिव-पार्वती बैठ गए। गणेश जी ने बड़े प्रेम और श्रद्धा से उनकी सात बार परिक्रमा की, फिर उनके चरणों में प्रणाम किया और बोले — "मेरी परिक्रमा पूरी हुई। फल मुझे दीजिए।"
"माता-पिता ही मेरा संसार हैं"
माता पार्वती ने हँसकर पूछा — "पुत्र, तुम तो यहीं से कहीं गए ही नहीं। फिर संसार की परिक्रमा कैसे हो गई?"
गणेश जी ने विनम्रता से उत्तर दिया — "माँ, शास्त्र कहते हैं कि माता-पिता की सेवा और परिक्रमा करने वाले को पूरी पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्य मिलता है। मेरे लिए तो आप दोनों ही पूरा संसार हैं। आपमें ही सारे तीर्थ हैं, सारे लोक हैं।"
उनकी बुद्धि और भक्ति देखकर शिव-पार्वती बहुत प्रसन्न हुए और फल गणेश जी को दे दिया।
कार्तिकेय का लौटना
बहुत समय बाद, थके-हारे कार्तिकेय पूरी पृथ्वी घूमकर लौटे। उन्होंने देखा कि फल तो गणेश जी के पास है। सारी बात जानकर उन्हें दुःख भी हुआ और कुछ रूठ भी गए। वे कैलाश छोड़कर दूर पर्वत पर जाकर रहने लगे। शिव पुराण में उनके क्रौंच पर्वत पर जाने का उल्लेख है, और तमिल परंपरा में यह स्थान पलनी पहाड़ी माना जाता है, जहाँ आज भी कार्तिकेय (मुरुगन) का प्रसिद्ध मंदिर है। माता-पिता प्रेम से उनसे मिलने वहाँ जाते रहे।
शिव पुराण वाला रूप
शिव पुराण के अनुसार दोनों भाई विवाह योग्य हुए, तो प्रश्न उठा कि पहले किसका विवाह हो। शिव-पार्वती ने वही शर्त रखी — जो पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटे। गणेश जी ने माता-पिता की परिक्रमा की, और उनका विवाह प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि से हुआ।
कथा से सीख
- माता-पिता का स्थान सबसे ऊँचा: गणेश जी ने दिखाया कि माता-पिता का आदर और सेवा सबसे बड़ा तीर्थ है।
- ताकत से बड़ी बुद्धि: तेज़ वाहन न होने पर भी गणेश जी ने सोच-समझकर रास्ता निकाला। हर समस्या का हल सिर्फ़ दौड़-भाग से नहीं, समझदारी से भी निकलता है।
- जल्दबाज़ी से पहले सोचें: कार्तिकेय तुरंत उड़ गए, एक पल रुककर नहीं सोचा। कोई भी काम शुरू करने से पहले उसका असली अर्थ समझना ज़रूरी है।
- भाई-भाई का प्रेम: परिवार में होड़ हो सकती है, पर प्रेम बना रहना चाहिए — माता-पिता दोनों पुत्रों से समान प्रेम करते रहे।
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