श्रवण कुमार की कथा — माता-पिता की सेवा और राजा दशरथ का शब्दभेदी बाण
अंधे माता-पिता के सेवक बालक की कथा, राजा दशरथ की एक भूल और उसका श्राप — वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड से, आसान शब्दों में।
माता-पिता की सेवा की बात आते ही सबसे पहला नाम आता है — श्रवण कुमार। यह कथा वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में आती है, जहाँ राजा दशरथ स्वयं इसे रानी कौशल्या को सुनाते हैं।
एक रोचक बात: वाल्मीकि रामायण में इस बालक का नाम नहीं लिया गया है — उसे बस "मुनिकुमार" या "तपस्वी का पुत्र" कहा गया है। "श्रवण कुमार" नाम और काँवड़ में माता-पिता को तीर्थ ले जाने का प्रसंग बाद की लोक-परंपरा और कथाओं से आया है। हम यहाँ परंपरा का प्यारा नाम ही इस्तेमाल कर रहे हैं।
कथा
दशरथ का दुःख
श्रीराम वन को जा चुके थे। अयोध्या सूनी थी, और राजा दशरथ का मन पुत्र-वियोग में टूट चुका था। आधी रात को उन्होंने कौशल्या से कहा — "देवी, मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है। आज मुझे अपनी युवावस्था की एक भूल याद आ रही है। उसी का फल मैं भोग रहा हूँ।" और उन्होंने यह कथा सुनाई।
शब्दभेदी बाण
युवराज दशरथ धनुर्विद्या में बहुत कुशल थे। वे केवल आवाज़ सुनकर भी निशाना लगा सकते थे — इसे शब्दभेदी बाण चलाना कहते हैं। उन्हें अपनी इस कला पर बड़ा गर्व था।
वर्षा ऋतु की एक रात वे शिकार के लिए सरयू नदी के किनारे गए। चारों ओर घना अँधेरा था। तभी नदी की ओर से "गुड़-गुड़" की आवाज़ आई, जैसे कोई हाथी पानी पी रहा हो। दशरथ ने सोचा कि कोई जंगली हाथी है, और बिना देखे आवाज़ की दिशा में बाण छोड़ दिया।
बाण छूटते ही एक मनुष्य की करुण पुकार सुनाई दी — "हाय! मुझ निर्दोष को किसने मारा? मैं तो रात में पानी भरने आया था।"
घायल बालक
दशरथ काँप उठे। दौड़कर पहुँचे तो देखा, एक युवा तपस्वी घायल पड़ा है, पास में पानी का घड़ा लुढ़का हुआ है। उस बालक ने दशरथ को देखकर कहा — "राजन्, मैंने आपका क्या बिगाड़ा था? मेरे माता-पिता बूढ़े और अंधे हैं। वे प्यासे बैठे मेरी राह देख रहे हैं। मेरे बिना उनका कौन सहारा होगा?"
उस घड़ी में भी उसे अपनी पीड़ा से ज़्यादा माता-पिता की चिंता थी। उसने कहा — "आप यह जल लेकर उनके पास जाइए, और उन्हें सब सच-सच बता दीजिए। और यह बाण मेरे शरीर से निकाल दीजिए, इसकी पीड़ा सही नहीं जाती।"
दशरथ ने भारी मन से बाण निकाला, और उसी क्षण उस सेवाभावी बालक ने प्राण त्याग दिए।
अंधे माता-पिता
दशरथ घड़ा भरकर उस कुटिया में पहुँचे जहाँ दो बूढ़े, अंधे तपस्वी बैठे थे। पैरों की आहट सुनकर पिता बोले — "बेटा, इतनी देर क्यों लगा दी? तुम्हारी माँ प्यासी है। तुम चुप क्यों हो? कुछ बोलते क्यों नहीं?"
दशरथ का गला भर आया। उन्होंने हाथ जोड़कर सारी बात बता दी — "मैं आपका पुत्र नहीं, अयोध्या का दशरथ हूँ। अनजाने में मेरे बाण से आपका पुत्र मारा गया।"
यह सुनकर दोनों पर जैसे वज्र गिर पड़ा। उन्होंने कहा — "हमें अपने पुत्र के पास ले चलो।" दशरथ उन्हें नदी किनारे ले गए। माता-पिता ने अपने बेटे के शरीर को छूकर विलाप किया। पिता ने कहा — "राजन्, तुमने सच बता दिया, यह अच्छा किया। यदि छिपाते तो तुम्हारा और भी बुरा होता। पर जैसे आज हम पुत्र के वियोग में प्राण छोड़ रहे हैं, वैसे ही एक दिन तुम भी पुत्र के वियोग में प्राण त्यागोगे।"
इसके बाद उन दोनों ने अपने पुत्र के साथ ही देह त्याग दी।
श्राप का पूरा होना
कथा पूरी करते हुए दशरथ बोले — "कौशल्या, आज वह वचन सच हो रहा है। राम मुझसे दूर हैं, और मेरे प्राण अब नहीं टिकेंगे।" उसी रात राजा दशरथ ने "हा राम, हा राम" कहते हुए देह छोड़ दी।
कथा से सीख
- माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म: मरते समय भी उस बालक को केवल अपने माता-पिता की प्यास की चिंता थी। इसीलिए आज भी आज्ञाकारी, सेवाभावी संतान को "श्रवण कुमार" कहा जाता है।
- बिना देखे कदम न उठाएँ: दशरथ ने अपनी कला के घमंड में बिना देखे बाण चला दिया। जल्दबाज़ी और अहंकार में किया गया काम कभी-कभी जीवन भर का पछतावा बन जाता है।
- सच बोलने का साहस: दशरथ ने अपनी भूल छिपाई नहीं, सामने जाकर स्वीकार की। गलती मान लेना ही सुधार का पहला कदम है।
- कर्म का फल: जैसा कर्म, वैसा फल — यह बात बड़े-से-बड़े राजा पर भी लागू होती है।
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