जय संतोषी माता — आरती (पूरे बोल और सरल अर्थ)
शुक्रवार व्रत में गाई जाने वाली "जय संतोषी माता" आरती के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ और आरती का आसान तरीका।
माँ संतोषी का नाम ही उनका संदेश है: संतोष। जो मिला है उसमें खुश रहना, कम में भी सबको बाँटकर मुस्कुराना। उत्तर भारत के लाखों घरों में शुक्रवार के दिन माँ संतोषी का व्रत रखा जाता है, कथा सुनी जाती है और अंत में यह आरती गाई जाती है।
लोक-परंपरा में माँ संतोषी को भगवान श्री गणेश की पुत्री माना जाता है। उनका भोग बहुत सादा है, गुड़ और भुने चने। यही सादगी इस आरती में भी झलकती है।
आरती के पूरे बोल
कुछ जगह शब्द थोड़े अलग गाए जाते हैं (जैसे "जी भरकर पावे" की जगह "जी भर के पावे")। भाव एक ही है।
सरल अर्थ
टेक: हे संतोषी माँ, आपकी जय हो। आप अपने सेवकों को सुख और समृद्धि देने वाली हैं।
सुनहरी चुनरी वाला पद: माँ ने सुंदर सुनहरी चुनरी ओढ़ी है। हीरे और पन्ने चमक रहे हैं, माँ का पूरा श्रृंगार बहुत सुंदर है।
गेरू लाल वाला पद: माँ के रूप पर गेरुए-लाल रंग की आभा है और मुख कमल जैसा खिला है। करुणा से भरी माँ की मंद मुस्कान तीनों लोकों का मन मोह लेती है।
सिंहासन वाला पद: माँ सोने के सिंहासन पर बैठी हैं और प्रेम से चँवर डुलाया जा रहा है। भक्त धूप, दीप, शहद और मेवे का सुंदर भोग लगा रहे हैं।
गुड़-चना वाला पद: इतने सारे भोगों में भी माँ को सादा गुड़ और चना सबसे प्रिय है, उसी में वे संतुष्ट हो जाती हैं। इसी से वे "संतोषी" कहलाईं और भक्तों को सुख-वैभव दिया। यानी भगवान को महँगे भोग की नहीं, सच्चे मन की चाह है।
शुक्रवार वाला पद: माँ को शुक्रवार प्रिय है, और आज वही दिन है। भक्तों की मंडली जुटी है और सब मगन होकर माँ की कथा सुन रहे हैं।
मंदिर वाला पद: मंदिर दीयों की ज्योति से जगमगा रहा है, चारों ओर मंगल ध्वनि है। हम आपके बच्चे आपके चरणों में सिर झुकाकर विनती करते हैं।
विनती वाला पद: हे माँ, हमारी भाव भरी पूजा स्वीकार करो, और जो शुभ इच्छा हमारे मन में है, उसे पूरा करो।
कृपा वाले पद: माँ ने दुखी, गरीब और रोगी लोगों को संकट से उबारा, घरों को धन-धान्य, सुख और सौभाग्य से भरा। जिसने भी माँ का ध्यान किया, पूजा और कथा सुनी, उसके घर आनंद आया, ऐसा भक्तों का अनुभव और विश्वास है।
शरण वाला पद: हे जगदंबा, जो आपकी शरण में आया है, उसकी लाज रखना। हे दयामयी अंबे, संकट आप ही दूर करती हो।
अंतिम पद: जो भी माँ संतोषी की यह आरती गाता है, उस पर ऋद्धि-सिद्धि, सुख और समृद्धि की कृपा बरसती है, यही भक्त की भावना है।
इस आरती की सीख
माँ संतोषी की पूजा का सबसे बड़ा पाठ है: संतोष ही सबसे बड़ा धन है। जिस घर में लोग एक-दूसरे से जलन नहीं करते, जो है उसे बाँटकर खाते हैं और भगवान को धन्यवाद देते हैं, वहाँ अपने आप सुख रहता है।
गुड़-चने का भोग यह भी सिखाता है कि पूजा अमीर-गरीब सबके लिए एक जैसी है। दो मुट्ठी चने और थोड़ा गुड़, बस इतने से माँ प्रसन्न हैं।
कैसे गाएँ / पढ़ें
- शुक्रवार को सुबह स्नान करके माँ संतोषी का चित्र रखें, एक कलश में जल भरें और दीपक जलाएँ।
- एक कटोरी में गुड़ और भुने चने भोग के लिए रखें। फूल, रोली और अक्षत चढ़ाएँ।
- माँ संतोषी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर सब मिलकर यह आरती गाएँ और थाली घुमाएँ।
- आरती के बाद गुड़-चने का प्रसाद बच्चों और परिवार में बाँटें।
परंपरा में शुक्रवार के व्रत वाले दिन खट्टी चीज़ें (जैसे इमली, नींबू, दही) न खाने और न बाँटने का नियम माना जाता है। इसे श्रद्धा और संयम के रूप में अपनाएँ, डर के रूप में नहीं; माँ का स्वभाव तो करुणा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
माँ संतोषी का व्रत कितने शुक्रवार रखा जाता है?
लोक-परंपरा में बहुत से लोग 16 शुक्रवार का व्रत रखते हैं और अंत में उद्यापन करते हैं। पर यह मन की श्रद्धा पर है। कोई केवल शुक्रवार को आरती और गुड़-चने का भोग भी लगाता है, वह भी पूरी पूजा है।
माँ संतोषी की पूजा कब से प्रचलित है?
माँ संतोषी की उपासना मुख्य रूप से उत्तर और पश्चिम भारत की लोक-परंपरा से आई है और पिछली सदी में यह पूरे देश में बहुत लोकप्रिय हो गई। उन्हें माँ दुर्गा और जगदंबा का ही एक कोमल रूप मानकर पूजा जाता है, जैसा आरती के "जगदंबे" और "अंबे" शब्दों में भी दिखता है।
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