जय लक्ष्मी रमणा — श्री सत्यनारायण जी की आरती (पूरे बोल और अर्थ)
सत्यनारायण व्रत कथा के बाद गाई जाने वाली आरती "जय लक्ष्मी रमणा" के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ और आरती का तरीका।
पूर्णिमा हो, गृह-प्रवेश हो, नया काम शुरू हो या कोई मनोकामना पूरी हुई हो, बहुत से घरों में श्री सत्यनारायण भगवान की कथा होती है। कथा के पाँचों अध्याय पूरे होने पर जो आरती गाई जाती है, वह है "जय लक्ष्मी रमणा"।
"लक्ष्मी रमण" का अर्थ है माता लक्ष्मी के पति, यानी भगवान विष्णु। सत्यनारायण भगवान विष्णु का ही "सत्य" रूप हैं। इस आरती के पदों में कथा के पात्र एक-एक करके आते हैं: गरीब ब्राह्मण, लकड़हारा, राजा, साधु वैश्य और ग्वाल-बाल। इसलिए कथा सुनने के बाद यह आरती और भी अर्थपूर्ण लगती है।
श्री सत्यनारायण व्रत कथा सुनें
आरती के पूरे बोल
अलग-अलग पुस्तकों में अंतिम पद के शब्द थोड़े बदल जाते हैं (जैसे "ऋद्धि-सिद्धि सुख-सम्पत्ति, सहज रूप पावे")। आपके घर में जो रूप चलता आया है, वही गाइए।
सरल अर्थ
टेक: हे लक्ष्मीपति स्वामी, आपकी जय हो। हे सत्यनारायण भगवान, आप भक्तों के पाप और दुख हरने वाले हैं।
पहला पद: आप रत्नों से जड़े सिंहासन पर विराजमान हैं और आपकी छवि अद्भुत है। देवर्षि नारद आपकी आरती उतार रहे हैं और घंटे की मधुर ध्वनि गूँज रही है।
दूसरा पद: कलियुग में लोगों का भला करने के लिए आप प्रकट हुए। आपने एक गरीब ब्राह्मण (शतानंद) को बूढ़े ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए, उसे व्रत का मार्ग बताया और उसका जीवन सुख-समृद्धि से भर दिया। "कंचन महल" उसी सुख का प्रतीक है।
तीसरा पद: आपने कमज़ोर, गरीब भील लकड़हारे पर भी कृपा की, जिसने ब्राह्मण को देखकर श्रद्धा से व्रत किया। और एक राजा के संकट भी आपने दूर किए, जिन्हें आरती में चंद्रचूड़ नाम से याद किया गया है।
चौथा पद: साधु वैश्य की मनोकामना पूरी हुई, पर उसने अपना वचन भुलाकर श्रद्धा छोड़ दी। उसका कड़वा फल उसे भोगना पड़ा, फिर उसने अपनी भूल मानकर आपकी स्तुति की और आपने उसे क्षमा किया।
पाँचवाँ पद: भक्तों के सच्चे भाव और भक्ति के कारण आप पल-पल नए रूप धरते हैं। जिसने भी मन में श्रद्धा रखी, उसका काम बन गया।
छठा पद: एक राजा (तुंगध्वज) ने पहले ग्वालों के प्रसाद का अनादर किया, फिर अपनी भूल समझकर उन्हीं ग्वाल-बालों के साथ वन में भक्ति की। दीनों पर दया करने वाले हरि ने उसे भी मनचाहा फल दिया।
सातवाँ पद: सवाया प्रसाद (सवा मात्रा में), केले और मेवे चढ़ाए जाते हैं। धूप, दीप और तुलसी-दल से ही सत्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं, यानी भगवान को दिखावा नहीं, भाव चाहिए।
अंतिम पद: जो कोई श्री सत्यनारायण जी की यह आरती गाता है, उसके तन-मन को सुख मिले और उसकी शुभ इच्छाएँ पूरी हों, यही भक्त का विश्वास इस पद में गाया गया है।
इस आरती की सीख
पूरी आरती एक ही बात दोहराती है: भगवान अमीर-गरीब, राजा-लकड़हारा, किसी में भेद नहीं करते। जो श्रद्धा से याद करता है, उस पर कृपा होती है। और जो वादा करके भूल जाता है या दूसरों के प्रसाद का अपमान करता है, वह अपनी भूल का फल पाता है, पर सच्चे मन से क्षमा माँगने पर रास्ता फिर खुल जाता है।
"सत्य" ही नारायण है। इसलिए यह व्रत हमें सच बोलने, वचन निभाने और कृतज्ञ रहने की याद दिलाता है।
कैसे गाएँ / पढ़ें
- सत्यनारायण कथा के पाँचों अध्याय पूरे होने के बाद, भगवान के सामने घी का दीपक या कपूर जलाकर आरती की थाली तैयार करें।
- शंख या घंटी बजाकर सब मिलकर "जय लक्ष्मी रमणा" गाएँ और थाली को भगवान के सामने धीरे-धीरे घुमाएँ।
- आरती के बाद सब लोग दोनों हाथों से आरती की लौ का आशीर्वाद लें और फिर पंचामृत व प्रसाद (पंजीरी/सवा प्रसाद, केला, तुलसी) बाँटें।
- कथा न भी हो, तो पूर्णिमा की शाम दीप जलाकर यह आरती और ओम जय जगदीश हरे गाई जा सकती है।
परंपरा में कथा के बाद प्रसाद ज़रूर ग्रहण करने को कहा जाता है। यही कथा का भाव भी है कि भगवान के प्रसाद का आदर करें।
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