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ॐ नमः शिवाय — पंचाक्षर मंत्र का अर्थ, स्रोत और जप विधि

भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का शब्दार्थ, हर अक्षर का भाव, वेद में इसका स्रोत और जप करने का आसान तरीका।

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इस लेख में
  1. मंत्र
  2. शब्दार्थ
  3. भावार्थ
  4. स्रोत: वेद में पंचाक्षर
  5. पाँच अक्षरों का भाव
  6. जप कैसे करें
  7. ध्यान रखने योग्य बातें
  8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

"ॐ नमः शिवाय" शायद सबसे सरल और सबसे प्रिय मंत्र है। न लंबा है, न कठिन। मंदिर की घंटियों के बीच, सावन के महीने में, महाशिवरात्रि की रात या सुबह की सैर में, लोग इसे बिना किसी दिखावे के मन ही मन दोहराते रहते हैं।

इसे पंचाक्षर मंत्र कहते हैं, क्योंकि "नमः शिवाय" में पाँच अक्षर हैं: न, मः, शि, वा, य। आगे "ॐ" लगाने पर यह छह अक्षरों वाला (षडक्षर) मंत्र बन जाता है।

मंत्र

ॐ नमः शिवाय॥

शब्दार्थ

  • ॐ: परमात्मा का मूल नाद, सारी सृष्टि की पहली ध्वनि। हर मंत्र इसी से शुरू होता है।
  • नमः: नमन, प्रणाम। इसका गहरा भाव है "न मम", यानी "यह मेरा नहीं"; अपना अहंकार झुका देना।
  • शिवाय: शिव को। "शिव" शब्द का अर्थ ही है कल्याणकारी, मंगलमय, शुभ।

भावार्थ

"मैं उस मंगलमय शिव को प्रणाम करता हूँ, जो सबका कल्याण करने वाले हैं।"

यह कोई माँग वाला मंत्र नहीं है। इसमें बस झुकना है, समर्पण है। जब हम कहते हैं "नमः शिवाय", तो हम अपने "मैं" को थोड़ा छोटा करके उस शुभ शक्ति के आगे रखते हैं, जो हर जीव के भीतर भी है।

स्रोत: वेद में पंचाक्षर

"नमः शिवाय" शब्द यजुर्वेद के प्रसिद्ध श्री रुद्रम् (रुद्राध्याय या नमकम्) में आते हैं। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (4.5.8) और शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता (16.41) में यह मंत्र मिलता है:

नमः शम्भवाय च मयोभवाय चनमः शङ्कराय च मयस्कराय चनमः शिवाय च शिवतराय च॥

सरल अर्थ: सुख के स्रोत (शम्भु) को नमस्कार, आनंद देने वाले को नमस्कार। कल्याण करने वाले (शंकर) को नमस्कार, सुख रचने वाले को नमस्कार। मंगलमय शिव को नमस्कार, और उनसे भी अधिक मंगलमय रूप को नमस्कार।

बाद में शिव पुराण और शैव परंपरा के ग्रंथों में "नमः शिवाय" को शिव का मूल मंत्र कहा गया। आदि शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध शिव पंचाक्षर स्तोत्र में पाँचों अक्षरों पर एक-एक श्लोक है।

पाँच अक्षरों का भाव

परंपरा में पंचाक्षर के हर अक्षर को अलग-अलग ढंग से समझाया गया है। दो सबसे प्रचलित व्याख्याएँ ये हैं।

1. पंचाक्षर स्तोत्र के अनुसार

शिव पंचाक्षर स्तोत्र में हर अक्षर से शिव के एक रूप का स्मरण होता है। पहला श्लोक "न" अक्षर का है:

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥

अर्थ: जो नागराज को हार की तरह पहनते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जिनके अंगों पर भस्म का लेप है, जो महेश्वर हैं, नित्य हैं, शुद्ध हैं और दिशाएँ ही जिनके वस्त्र हैं, उन "न" अक्षर रूपी शिव को नमस्कार।

इसी तरह आगे के श्लोकों में:

  • म: गंगा (मंदाकिनी) के जल और चंदन से पूजित, नंदी और गणों के स्वामी शिव।
  • शि: माता गौरी के मुख-कमल को प्रसन्न करने वाले, जिनकी ध्वजा पर नंदी (वृषभ) है, वे नीलकंठ शिव।
  • वा: वसिष्ठ, अगस्त्य, गौतम जैसे ऋषि और देवता जिनकी पूजा करते हैं; सूर्य, चंद्र और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं।
  • य: यक्ष रूप वाले, जटाधारी, हाथ में पिनाक धनुष लिए, सनातन और दिगंबर शिव।

2. पाँच तत्वों के रूप में

कई परंपराओं में पाँच अक्षरों को पाँच महाभूतों से जोड़ा जाता है: न पृथ्वी, म जल, शि अग्नि, वा वायु और य आकाश। यानी यह मंत्र याद दिलाता है कि पूरी सृष्टि, और हमारा शरीर भी, इन्हीं पाँच तत्वों से बना है और इन सबमें शिव ही व्याप्त हैं।

शैव सिद्धांत जैसी कुछ परंपराओं में इन अक्षरों की और भी गहरी आध्यात्मिक व्याख्याएँ हैं। सब व्याख्याएँ एक ही बात पर आती हैं: शिव सबमें हैं, और नमन से मन शुद्ध होता है।

जप कैसे करें

  1. समय: सुबह स्नान के बाद, शाम को दीप जलाकर, या सोने से पहले। सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर विशेष रूप से जप किया जाता है, पर यह मंत्र किसी भी दिन, किसी भी समय जपा जा सकता है।
  2. आसन: एक साफ़ आसन पर पीठ सीधी करके बैठें। सामने शिवलिंग या शिव जी का चित्र हो तो अच्छा, न हो तो आँखें बंद करके मन में शिव का ध्यान करें।
  3. माला: परंपरा में रुद्राक्ष की माला पर 108 बार जप किया जाता है। माला न हो तो उंगलियों पर गिनें, या बिना गिनती के 5-10 मिनट तक जपें।
  4. उच्चारण: "ॐ" को थोड़ा लंबा, फिर "न-मः शि-वा-य" साफ़-साफ़। हर बार साँस के साथ लय बनाएँ।
  5. तीन तरीके: ज़ोर से बोलकर (वाचिक), होंठ हिलाकर धीमे स्वर में (उपांशु), या केवल मन में (मानसिक)। शुरुआत बोलकर करें, धीरे-धीरे मन में जप करना सीखें।
  6. अंत में: जप के बाद कुछ पल शांत बैठें, शिव जी को प्रणाम करें और चाहें तो शिव जी की आरती गाएँ।

बहुत-सी परंपराओं में "ॐ नमः शिवाय" को सबके लिए सुलभ मंत्र माना गया है, बच्चे, बड़े, स्त्री, पुरुष, सब इसे प्रेम से जप सकते हैं।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • मंत्र गिनती की होड़ नहीं है। 108 बार मन भटकते हुए जपने से अच्छा है 11 बार पूरे मन से जपना।
  • जप करते समय मन में कोई डर या सौदा न रखें। यह प्रेम और समर्पण का मंत्र है।
  • मंत्र जप मन को शांत करने और भक्ति बढ़ाने का साधन है। बीमारी या कठिन परिस्थिति में डॉक्टर की सलाह और अपने कर्तव्य के साथ इसे करें, उनकी जगह नहीं।
  • शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए भी यह मंत्र बोला जाता है। एक लोटा जल और सच्चा भाव, शिव जी के लिए इतना काफ़ी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

"ॐ नमः शिवाय" और "महामृत्युंजय मंत्र" में क्या अंतर है?

"ॐ नमः शिवाय" छोटा, सरल नमन का मंत्र है जिसे कभी भी जपा जा सकता है। महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का एक श्लोक है, जिसमें शिव से रक्षा और मुक्ति की प्रार्थना है। दोनों शिव भक्ति के सुंदर मार्ग हैं।

शिव को नीलकंठ क्यों कहते हैं?

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