नवग्रह स्तोत्र और नवग्रह मंत्र — सरल अर्थ सहित
वेदव्यास रचित माने जाने वाले नवग्रह स्तोत्र के नौ श्लोक, हर ग्रह का सरल परिचय, प्रचलित बीज मंत्र और पाठ का भक्तिपूर्ण तरीका।
इस लेख में
सनातन परंपरा में सूर्य, चंद्रमा और आकाश के दूसरे ग्रहों को केवल पत्थर या गैस के गोले नहीं, बल्कि देवता के रूप में देखा गया है, जो समय, ऋतु, दिन-रात और जीवन की लय से जुड़े हैं। इन्हीं नौ को नवग्रह कहते हैं: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि, राहु और केतु।
बहुत-से मंदिरों में नवग्रहों का अलग मंडप होता है, और किसी भी बड़ी पूजा, गृह-प्रवेश या विवाह की शुरुआत में नवग्रहों को प्रणाम किया जाता है। इस पेज पर सबसे प्रचलित नवग्रह स्तोत्र, एक छोटा "सर्वग्रह" श्लोक और हर ग्रह का बीज मंत्र सरल अर्थ के साथ दिया है।
यह पेज भक्ति और परंपरा की जानकारी के लिए है। नवग्रहों का स्मरण आभार और प्रणाम का भाव है, किसी डर का नहीं। ग्रहों से डरकर या किसी के डराने पर महँगे उपाय करने की ज़रूरत नहीं।
एक श्लोक में नवग्रह वंदना
समय कम हो तो यह एक श्लोक पढ़ा जाता है, जिसमें त्रिदेव के साथ नौ ग्रहों को प्रणाम है:
सरल अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु (मुर राक्षस के शत्रु) और शिव (त्रिपुर का अंत करने वाले), तथा सूर्य, चंद्रमा, मंगल (पृथ्वी के पुत्र), बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु, ये सब हमारे लिए शांति देने वाले हों।
नवग्रह स्तोत्र (नौ श्लोक, अर्थ सहित)
यह स्तोत्र परंपरा से महर्षि वेदव्यास का रचा माना जाता है; इसकी अंतिम फलश्रुति में इसे "व्यास जी के मुख से गाया गया" बताया गया है। हर श्लोक में एक ग्रह-देवता का रूप और उनकी पौराणिक पहचान है।
1. सूर्य
अर्थ: जो गुड़हल (जपा) के फूल जैसे लाल हैं, महर्षि कश्यप के पुत्र हैं, महान तेज वाले हैं, अंधकार के शत्रु हैं और सब पापों को मिटाने वाले हैं, उन दिन बनाने वाले सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
2. चंद्र
अर्थ: जो दही, शंख और बर्फ़ जैसे उजले हैं, क्षीर सागर से प्रकट हुए हैं और भगवान शिव के मस्तक का आभूषण हैं, उन चंद्रदेव (सोम) को मैं नमन करता हूँ।
3. मंगल
अर्थ: जो धरती माता से उत्पन्न हुए हैं, बिजली जैसी चमक वाले हैं, युवा (कुमार) हैं और हाथ में शक्ति-अस्त्र लिए हैं, उन मंगलदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
4. बुध
अर्थ: जो प्रियंगु की कली जैसे साँवले-हरे रंग के हैं, जिनका रूप अनुपम है, जो शांत स्वभाव के और कोमल गुणों से भरे हैं, उन बुधदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
5. बृहस्पति (गुरु)
अर्थ: जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, सोने जैसी आभा वाले हैं, बुद्धि के साक्षात रूप हैं और तीनों लोकों में पूज्य हैं, उन बृहस्पति देव को मैं नमन करता हूँ।
6. शुक्र
अर्थ: जो बर्फ़, कुंद के फूल और कमल-नाल जैसे उजले हैं, दैत्यों के परम गुरु हैं और सब शास्त्रों के ज्ञाता हैं, उन भृगुवंशी शुक्राचार्य को मैं प्रणाम करता हूँ।
7. शनि
अर्थ: जो नीले काजल जैसी आभा वाले हैं, सूर्य के पुत्र और यमराज के बड़े भाई हैं, माता छाया और सूर्यदेव से उत्पन्न हुए हैं, उन धीरे चलने वाले (शनैश्चर) शनिदेव को मैं नमन करता हूँ।
8. राहु
अर्थ: जिनका आधा शरीर है, जो बहुत बलवान हैं, जो सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगाते हैं और सिंहिका के पुत्र हैं, उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।
9. केतु
अर्थ: जो पलाश (टेसू) के फूल जैसे लाल-नारंगी रंग के हैं, तारों और ग्रहों में शिरोमणि हैं, जिनका रूप तेज और उग्र है, उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।
राहु और केतु की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है: अमृत बँटते समय एक असुर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर अलग किया, पर अमृत पी लेने से वह अमर हो चुका था। सिर राहु और धड़ केतु कहलाया। उस असुर को सूर्य और चंद्रमा ने पहचाना था, इसलिए कथा में ग्रहण को इसी प्रसंग से जोड़ा जाता है।
नवग्रहों के प्रचलित बीज मंत्र
बहुत-सी पूजा-पुस्तकों में हर ग्रह का एक छोटा "बीज मंत्र" दिया जाता है। सबसे प्रचलित रूप ये हैं:
- सूर्य: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
- चंद्र: ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः
- मंगल: ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः
- बुध: ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः
- बृहस्पति: ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
- शुक्र: ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः
- शनि: ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
- राहु: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः
- केतु: ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
भाव: "ह्रां, श्रां, क्रां" जैसे शब्द बीज-अक्षर हैं, जिन्हें परंपरा में देवता की शक्ति का संक्षिप्त नाद माना जाता है। हर मंत्र का अंत "...को नमस्कार" पर होता है, जैसे "सूर्याय नमः" यानी सूर्यदेव को प्रणाम।
अलग-अलग परंपराओं और पुस्तकों में बीज मंत्रों के रूप थोड़े अलग मिलते हैं। सरल भक्ति के लिए केवल नाम-मंत्र भी पूरा है, जैसे "ॐ सूर्याय नमः", "ॐ सोमाय नमः", "ॐ शनैश्चराय नमः"।
पाठ कैसे करें
- सुबह स्नान के बाद, घर के मंदिर में दीपक जलाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें।
- पहले भगवान गणेश को प्रणाम करें, फिर "ब्रह्मा मुरारि…" वाला श्लोक पढ़ें।
- उसके बाद नवग्रह स्तोत्र के नौ श्लोक धीरे-धीरे, साफ़ उच्चारण से पढ़ें। चाहें तो हर श्लोक के बाद उस ग्रह का नाम-मंत्र एक बार बोलें।
- परंपरा में हर वार एक ग्रह से जुड़ा है (रविवार सूर्य, सोमवार चंद्र, मंगलवार मंगल, बुधवार बुध, गुरुवार बृहस्पति, शुक्रवार शुक्र, शनिवार शनि)। उस दिन उस ग्रह का श्लोक या मंत्र विशेष रूप से पढ़ा जाता है, पर पूरा स्तोत्र किसी भी दिन पढ़ सकते हैं।
- अंत में सबके कल्याण की प्रार्थना करें और शांति मंत्र पढ़ें।
ध्यान रखने योग्य बातें
- नवग्रह स्तोत्र प्रकृति और समय के देवताओं के प्रति आभार का पाठ है। इसे डर से नहीं, श्रद्धा से पढ़ें।
- कोई भी मंत्र किसी निश्चित फल की "गारंटी" नहीं है। मंत्र मन को शांत, स्थिर और सकारात्मक बनाते हैं; जीवन की समस्याओं के लिए अपना कर्म, मेहनत और ज़रूरत हो तो विशेषज्ञ की सलाह ज़रूरी है।
- सूर्यदेव की उपासना के लिए गायत्री मंत्र और सुबह सूर्य को जल चढ़ाना भी बहुत सुंदर परंपरा है।
- सबसे बड़ी "ग्रह शांति" है अच्छा आचरण: माता-पिता का आदर, सच बोलना, ज़रूरतमंद की मदद। शास्त्र भी यही सिखाते हैं।
आगे पढ़ें: गायत्री मंत्र — शब्दार्थ, सरल भावार्थ और जप की विधि, शांति मंत्र — सह नाववतु, असतो मा सद्गमय, पूर्णमदः और अन्य (अर्थ सहित), समुद्र मंथन की कथा — चौदह रत्न, माँ लक्ष्मी और नीलकंठ महादेव, ॐ नमः शिवाय — पंचाक्षर मंत्र का अर्थ, स्रोत और जप विधि