शांति मंत्र — सह नाववतु, असतो मा सद्गमय, पूर्णमदः और अन्य (अर्थ सहित)
उपनिषदों और वेदों के पाँच प्रसिद्ध शांति मंत्र — शुद्ध बोल, स्रोत, शब्दार्थ, सरल भावार्थ और बोलने का तरीका।
इस लेख में
उपनिषदों का पाठ शुरू करने से पहले गुरु और शिष्य मिलकर जो प्रार्थना करते थे, उसे शांति पाठ कहते हैं। इन मंत्रों में न कोई माँग है, न कोई डर — केवल यह कामना है कि मन शांत रहे, पढ़ाई सफल हो और सारा संसार सुखी हो। स्कूलों, सभाओं और घर की पूजा में आज भी ये मंत्र बोले जाते हैं।
तीन बार "शान्तिः" क्यों?
हर शांति मंत्र के अंत में "ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः" बोला जाता है। परंपरा बताती है कि तीन बार शांति तीन तरह के दुखों से मुक्ति के लिए माँगी जाती है:
- आध्यात्मिक — अपने शरीर और मन से उठने वाले कष्ट (रोग, चिंता, क्रोध)।
- आधिभौतिक — दूसरे प्राणियों या लोगों से मिलने वाले कष्ट।
- आधिदैविक — प्रकृति से आने वाले कष्ट (बाढ़, भूकंप, आँधी)।
1. ॐ सह नाववतु — गुरु-शिष्य की प्रार्थना
स्रोत: कृष्ण यजुर्वेद की शाखा के उपनिषद् — तैत्तिरीय उपनिषद्, कठोपनिषद् और श्वेताश्वतर उपनिषद् का शांति पाठ।
शब्दार्थ: सह — साथ-साथ; नौ — हम दोनों (गुरु और शिष्य) की; अवतु — रक्षा करें; भुनक्तु — पालन करें; वीर्यम् — शक्ति, पराक्रम; करवावहै — हम दोनों करें; तेजस्वि — तेज से भरा; अधीतम् — पढ़ा हुआ; अस्तु — हो; मा विद्विषावहै — हम एक-दूसरे से द्वेष न करें।
भावार्थ: परमात्मा हम दोनों की साथ-साथ रक्षा करे, हम दोनों का साथ-साथ पालन करे। हम मिलकर पूरी शक्ति से मेहनत करें। हमारा पढ़ा हुआ ज्ञान तेजस्वी हो, और हम कभी एक-दूसरे से द्वेष न करें।
पढ़ाई शुरू करने से पहले बच्चों के साथ यह मंत्र बोलना बहुत सुंदर आदत है — इसमें गुरु और शिष्य बराबरी से एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करते हैं।
2. ॐ असतो मा सद्गमय — अंधकार से प्रकाश की ओर
स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28) — शुक्ल यजुर्वेद।
शब्दार्थ: असतः — असत्य से; मा — मुझे; सत् — सत्य की ओर; गमय — ले चलो; तमसः — अंधकार से; ज्योतिः — प्रकाश की ओर; मृत्योः — मृत्यु से; अमृतम् — अमरता की ओर।
भावार्थ: हे प्रभु, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
यह मंत्र दिवाली का भी सार है — दीप जलाना असल में "तमसो मा ज्योतिर्गमय" को जीना है। पढ़ें: दीपावली 2026 — तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और पाँच दिन का पूरा कैलेंडर।
3. सर्वे भवन्तु सुखिनः — सबके सुख की कामना
स्रोत: यह बहुत पुराना और लोकप्रिय प्रार्थना-श्लोक है, जो पीढ़ियों से शांति पाठ में बोला जाता है। इसका मूल किसी एक ग्रंथ में निश्चित रूप से बताना कठिन है, इसलिए इसे पारंपरिक प्रार्थना ही मानें।
शब्दार्थ: सर्वे — सभी; भवन्तु — हों; सुखिनः — सुखी; सन्तु — रहें; निरामयाः — रोग-रहित, स्वस्थ; भद्राणि — शुभ, अच्छी बातें; पश्यन्तु — देखें; मा कश्चित् — कोई भी नहीं; दुःखभाक् — दुख का भागी; भवेत् — हो।
भावार्थ: सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ रहें, सभी अच्छा ही देखें, और कोई भी दुख का भागी न बने।
ध्यान दीजिए — इसमें "मेरा परिवार" या "मेरा देश" नहीं, "सर्वे" यानी सारे जीव हैं। यही सनातन दृष्टि है।
4. ॐ पूर्णमदः — पूर्ण से पूर्ण
स्रोत: ईशावास्य (ईश) उपनिषद् का शांति पाठ; यही मंत्र बृहदारण्यक उपनिषद् (5.1.1) में भी है।
शब्दार्थ: पूर्णम् — पूर्ण, संपूर्ण; अदः — वह (परमात्मा); इदम् — यह (संसार); पूर्णात् — पूर्ण से; उदच्यते — प्रकट होता है; आदाय — निकाल लेने पर; एव — ही; अवशिष्यते — बचता है।
भावार्थ: वह (परमात्मा) पूर्ण है, यह (संसार) भी पूर्ण है। पूर्ण से ही पूर्ण प्रकट होता है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही बचता है।
सरल उदाहरण: एक दीपक से सौ दीपक जला लीजिए — पहले दीपक की लौ ज़रा भी कम नहीं होती। परमात्मा की पूर्णता ऐसी ही है, और हम भी उसी पूर्ण का अंश होकर अपने-आप में अधूरे नहीं हैं।
5. ॐ द्यौः शान्तिः — पूरी सृष्टि के लिए शांति
स्रोत: शुक्ल यजुर्वेद (36.17)।
शब्दार्थ: द्यौः — आकाश/द्युलोक; अन्तरिक्षम् — अंतरिक्ष; पृथिवी — धरती; आपः — जल; ओषधयः — औषधियाँ, जड़ी-बूटियाँ; वनस्पतयः — पेड़-पौधे; विश्वेदेवाः — सभी देवता; ब्रह्म — परम सत्य/ज्ञान; सर्वम् — सब कुछ; सा — वह (शांति); मा — मुझमें; एधि — बढ़े।
भावार्थ: आकाश में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, धरती पर शांति हो, जल में, औषधियों में और पेड़-पौधों में शांति हो। सभी देवताओं में, परम ज्ञान में, हर चीज़ में शांति हो। शांति ही शांति हो — और वह शांति मेरे भीतर भी बढ़े।
हज़ारों साल पुराना यह मंत्र आज के पर्यावरण-प्रेम की सबसे सुंदर प्रार्थना है — इसमें जल, पेड़ और धरती सबकी शांति माँगी गई है।
कैसे बोलें
- पढ़ाई, सभा, यज्ञ या पूजा की शुरुआत और अंत में।
- सीधे बैठकर, हाथ जोड़कर या ध्यान-मुद्रा में; सब मिलकर एक स्वर में बोलें तो वातावरण बहुत शांत हो जाता है।
- अंतिम "शान्तिः" थोड़ा लंबा और धीमा बोलें, फिर कुछ पल मौन रहें।
इन मंत्रों का कोई कठिन नियम नहीं है; ये हर उम्र, हर समय के लिए हैं। सबसे ज़रूरी है अर्थ समझकर, मन से बोलना।
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