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श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन — पूरी स्तुति और सरल अर्थ

गोस्वामी तुलसीदास की प्रसिद्ध राम स्तुति के पूरे बोल, हर छंद का सरल अर्थ और गाने का आसान तरीका।

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इस लेख में
  1. स्तुति के पूरे बोल
  2. सरल अर्थ
  3. इस स्तुति की खास बात
  4. कैसे गाएँ / पढ़ें
  5. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

"श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन" भगवान श्रीराम की सबसे मधुर स्तुतियों में से एक है। रामनवमी, दीपावली, सुंदरकांड पाठ या घर की रोज़ की आरती, हर जगह इसे बड़े प्रेम से गाया जाता है।

इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। यह उनकी पुस्तक विनय पत्रिका का एक पद है (आम तौर पर पद 45 के रूप में छपता है)। भाषा संस्कृत-मिश्रित अवधी है, इसलिए शब्द थोड़े भारी लगते हैं, पर अर्थ समझते ही यह स्तुति मन में बस जाती है।

स्तुति के पूरे बोल

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।नवकंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं॥१॥
कंदर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरं।पट पीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥२॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं।रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं॥३॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं।आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं॥४॥
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं।मम हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं॥५॥

स्तुति के बाद गाया जाने वाला अंश

बहुत से घरों और मंदिरों में इस स्तुति के बाद नीचे वाला छंद और सोरठा भी गाया जाता है। ये पंक्तियाँ विनय पत्रिका से नहीं, बल्कि श्रीरामचरितमानस के बालकांड से हैं, जहाँ माता गौरी (पार्वती) सीता जी को आशीर्वाद देती हैं।

मन जाहि राच्यो मिलहि सो बर सहज सुन्दर साँवरो।करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥

कुछ पुस्तकों में शब्दों की वर्तनी थोड़ी अलग मिलती है, जैसे "मानहु/मानहुँ" या "कन्दर्प/कंदर्प"। अर्थ और गायन में इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

सरल अर्थ

पहला छंद: हे मन, कृपा करने वाले श्री रामचन्द्र जी का भजन कर। वे जन्म-मरण के इस संसार के भयानक डर को दूर करने वाले हैं। उनकी आँखें नए खिले कमल जैसी हैं; मुख, हाथ और चरण भी कमल जैसे कोमल और लालिमा लिए हुए हैं।

दूसरा छंद: उनकी सुंदरता अनगिनत कामदेवों से भी बढ़कर है। उनका रंग नए, पानी से भरे नीले बादल जैसा सुंदर है। उनके पीले वस्त्र ऐसे चमकते हैं मानो बादल में बिजली चमक रही हो। ऐसे पवित्र, जनक-नंदिनी सीता जी के पति श्रीराम को मैं प्रणाम करता हूँ।

तीसरा छंद: हे मन, उनका भजन कर जो दीन-दुखियों के सच्चे मित्र हैं, सूर्य जैसे तेजस्वी हैं और दुष्ट राक्षसों के वंश का अंत करने वाले हैं। वे रघुकुल को आनंद देने वाले हैं, आनंद का मूल स्रोत हैं, कोशल देश के चंद्रमा हैं और राजा दशरथ के प्यारे पुत्र हैं।

चौथा छंद: उनके सिर पर मुकुट है, कानों में कुंडल हैं, माथे पर सुंदर तिलक है और सारे अंग सुंदर आभूषणों से सजे हैं। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं, हाथों में धनुष-बाण हैं, और उन्होंने युद्ध में खर और दूषण जैसे राक्षसों को जीता है।

पाँचवाँ छंद: तुलसीदास जी कहते हैं, जो श्रीराम भगवान शंकर, शेषनाग और मुनियों के मन को आनंद देते हैं, वे मेरे हृदय-कमल में निवास करें। वे काम, क्रोध, लोभ जैसे दुष्ट विकारों के झुंड का नाश करने वाले हैं।

मानस वाला अंश: माता गौरी सीता जी से कहती हैं: जिस साँवले, सहज सुंदर वर पर तुम्हारा मन रम गया है, वही तुम्हें मिलेगा। वे दया के भंडार और सब कुछ जानने वाले हैं, तुम्हारे स्वभाव और प्रेम को भली-भाँति जानते हैं। यह आशीर्वाद सुनकर सीता जी और उनकी सखियाँ मन ही मन बहुत प्रसन्न हुईं और बार-बार भवानी की पूजा करके खुशी-खुशी महल लौट चलीं। गौरी को प्रसन्न जानकर सीता जी के हृदय का आनंद कहा नहीं जा सकता; शुभ संकेत के रूप में उनके बाएँ अंग फड़कने लगे।

इस स्तुति की खास बात

इस स्तुति में तुलसीदास जी पहले श्रीराम का रूप हमारी आँखों के सामने खड़ा करते हैं, कमल जैसे नयन, बादल जैसा रंग, पीले वस्त्र, धनुष-बाण। फिर अंत में एक ही छोटी-सी माँग रखते हैं: "मेरे हृदय में बसिए और मेरे भीतर के बुरे विकार मिटाइए।"

यानी भक्ति का असली अर्थ धन या सुख माँगना नहीं, अपने मन को साफ़ करना है। जिस हृदय में राम बसते हैं, वहाँ क्रोध और लालच टिक नहीं पाते।

कैसे गाएँ / पढ़ें

  1. शाम की आरती के समय या रामनवमी, दीपावली, सुंदरकांड पाठ के अंत में दीपक जलाकर श्रीराम (या राम दरबार) के सामने बैठें।
  2. पहले दो-तीन बार धीरे पढ़कर शब्दों का उच्चारण साफ़ कर लें। "कंजारुणं", "निकन्दनं", "गंजनं" जैसे शब्दों पर रुककर पढ़ें।
  3. इसकी धुन धीमी और मधुर रखी जाती है। परिवार में एक व्यक्ति पंक्ति गाए और बाकी दोहराएँ, तो बच्चे भी जल्दी सीख जाते हैं।
  4. स्तुति के बाद मानस वाला छंद और सोरठा गाएँ, फिर आरती घुमाकर प्रसाद बाँटें।

शब्द कठिन लगें तो पहले ऊपर दिया अर्थ एक बार पढ़ लें। अर्थ समझकर गाने से स्तुति का भाव अपने आप उतर आता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह आरती है या स्तुति?

मूल रूप से यह विनय पत्रिका की एक स्तुति (विनय का पद) है। पर इसे आरती के समय इतना गाया जाता है कि लोग इसे "राम जी की आरती" भी कहते हैं।

"खरदूषण" कौन थे?

खर और दूषण रावण के भाई-बंधु राक्षस थे, जो दंडकारण्य (पंचवटी के पास) में रहते थे। वनवास के दिनों में श्रीराम ने अकेले उनकी सेना को हराया था। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में आता है।

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