🪔 व्रत-त्योहार

अक्षय नवमी / आंवला नवमी 2026 (18 नवंबर) — कथा, आंवला पूजा विधि और महत्व

अक्षय नवमी (आंवला नवमी) बुधवार 18 नवंबर 2026 को है, पूजा का शुभ समय सुबह 6:46 से दोपहर 12:06 तक। पढ़िए माता लक्ष्मी की कथा, आंवले के पेड़ की पूजा विधि और महत्व।

अक्षय नवमी / आंवला नवमी 2026 (18 नवंबर) — कथा, आंवला पूजा विधि और महत्व
📖 ४ मिनट पढ़ें
इस लेख में
  1. अक्षय नवमी 2026: तारीख़ और मुहूर्त (नई दिल्ली)
  2. अक्षय नवमी का महत्व
  3. आंवला नवमी की कथा
  4. आंवला नवमी पूजा विधि
  5. आंवला: सेहत का ख़ज़ाना

कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को अक्षय नवमी कहते हैं। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है, इसलिए इसे आंवला नवमी भी कहा जाता है। "अक्षय" का अर्थ है जो कभी क्षय न हो, यानी कभी कम न हो। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप, पूजा और सेवा का पुण्य अक्षय होता है, ठीक वैसे ही जैसे अक्षय तृतीया पर। यह पर्व देवउठनी एकादशी से दो दिन पहले आता है।

अक्षय नवमी 2026: तारीख़ और मुहूर्त (नई दिल्ली)

  • तारीख़: बुधवार, 18 नवंबर 2026
  • पूजा का शुभ समय (पूर्वाह्न): सुबह 6:46 से दोपहर 12:06 तक
  • नवमी तिथि: 18 नवंबर सुबह 6:04 से 19 नवंबर सुबह 7:05 तक

(स्रोत: drikpanchang.com। आपके शहर का समय कुछ मिनट अलग हो सकता है।)

अक्षय नवमी का महत्व

  • सतयुग का आरंभ: पौराणिक मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल नवमी से ही सतयुग का आरंभ हुआ था, इसलिए इसे "सत्य युगादि" भी कहते हैं।
  • आंवले में भगवान का वास: मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है, और कार्तिक मास में उसकी पूजा विशेष फलदायी है।
  • ब्रज में परिक्रमा: मथुरा-वृंदावन में इस दिन हज़ारों श्रद्धालु नगर की परिक्रमा करते हैं। कहा जाता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने वृंदावन छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान किया था।
  • कूष्मांड नवमी: बंगाल और ओडिशा की कई परंपराओं में इसी दिन को कूष्मांड नवमी के रूप में मनाया जाता है और कद्दू (कूष्मांड) का दान किया जाता है।

आंवला नवमी की कथा

एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करने आईं। उनके मन में इच्छा हुई कि वे भगवान विष्णु और भगवान शिव, दोनों की पूजा एक साथ करें। पर यह कैसे हो? भगवान विष्णु को तुलसी प्रिय है और भगवान शिव को बेल।

माता लक्ष्मी ने सोचा कि ऐसा कौन-सा वृक्ष है जिसमें तुलसी और बेल, दोनों के गुण हों। उन्हें आंवले का ध्यान आया — आंवले में तुलसी जैसी पवित्रता भी है और बेल जैसे गुण भी। इसलिए उन्होंने आंवले के वृक्ष को ही विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की।

पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और भगवान शिव, दोनों वहाँ प्रकट हुए। माता लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष के नीचे ही भोजन बनाया और दोनों को प्रेम से भोजन कराया, फिर स्वयं प्रसाद ग्रहण किया। वह दिन कार्तिक शुक्ल नवमी था। तभी से इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करने और उसके नीचे बैठकर भोजन करने की परंपरा चली आ रही है।

कथा की सीख: सच्ची भक्ति रास्ता ढूँढ़ ही लेती है, और प्रकृति (पेड़-पौधे) में भी भगवान का वास है। आंवले की पूजा हमें पेड़ों का सम्मान करना सिखाती है।

आंवला नवमी पूजा विधि

  1. सुबह: स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और पूजा का संकल्प लें। पूजा पूर्वाह्न (सुबह 6:46 से दोपहर 12:06) में करना शुभ माना जाता है।
  2. आंवले का पेड़: आंवले के पेड़ के पास जाकर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठें। पेड़ के आसपास की जगह साफ़ कर लें।
  3. जल और दूध: पेड़ की जड़ में जल और थोड़ा कच्चा दूध चढ़ाएँ।
  4. पूजन: रोली, अक्षत (चावल), हल्दी, फूल और धूप से पेड़ की पूजा करें। घी का दीपक जलाएँ।
  5. कच्चा सूत: पेड़ के तने पर कच्चा सूत या कलावा लपेटते हुए 7 या 108 बार परिक्रमा करें।
  6. कथा और आरती: ऊपर दी गई कथा पढ़ें, फिर ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ) आरती करें।
  7. भोजन: संभव हो तो परिवार के साथ आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करें, या पेड़ के पास बना भोजन प्रसाद रूप में ग्रहण करें। भोजन में आंवला ज़रूर शामिल करें।
  8. दान: आंवला, अन्न, कपड़े या अपनी क्षमता अनुसार दान दें। इस दिन का दान अक्षय फल देने वाला माना जाता है।

अगर आपके आसपास आंवले का पेड़ नहीं है, तो घर में गमले में लगे आंवले के पौधे की पूजा करें, या भगवान विष्णु के सामने आंवला रखकर पूजा करें। श्रद्धा ही सबसे बड़ी पूजा है।

आंवला: सेहत का ख़ज़ाना

आयुर्वेद में आंवले को "अमृत फल" कहा गया है। इसमें विटामिन C भरपूर होता है, जो सर्दियों की शुरुआत में शरीर को मज़बूत रखता है। आंवले का मुरब्बा, चटनी या कच्चा आंवला — इस दिन से इसे अपने भोजन में शामिल करने की अच्छी शुरुआत कर सकते हैं।

अक्षय नवमी के दो दिन बाद देवउठनी एकादशी (20 नवंबर) और फिर तुलसी विवाह आता है: देवउठनी एकादशी 2026 (20 नवंबर) और कार्तिक की एकादशियाँ — व्रत विधि, पारण और तुलसी विवाह, तुलसी विवाह 2026 — 21 नवंबर: विधि, कथा और महत्व। कार्तिक मास का समापन कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर) पर होता है: कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली 2026 — 24 नवंबर: गंगा स्नान, दीपदान और महत्व

यह भी पढ़ें

देवउठनी एकादशी 2026 (20 नवंबर) और कार्तिक की एकादशियाँ — व्रत विधि, पारण और तुलसी विवाहदेवउठनी एकादशी शुक्रवार 20 नवंबर 2026 को है और रमा एकादशी 5 नवंबर को। एकादशी व्रत क्या है, कैसे रखें, पारण कब करें और तुलसी विवाह का महत्व।तुलसी विवाह 2026 — 21 नवंबर: विधि, कथा और महत्वतुलसी विवाह 2026 शनिवार 21 नवंबर (कार्तिक शुक्ल द्वादशी) को है। घर पर तुलसी-शालिग्राम विवाह की आसान विधि, सामग्री, कथा और इसका अर्थ।कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली 2026 — 24 नवंबर: गंगा स्नान, दीपदान और महत्वकार्तिक पूर्णिमा 2026 मंगलवार 24 नवंबर को है। इसी शाम काशी के घाटों पर देव दीपावली मनाई जाती है। जानिए स्नान-दान, दीपदान और त्रिपुरासुर की कथा।माँ लक्ष्मी — परिचय, स्वरूप का अर्थ, अष्टलक्ष्मी, कथाएँ और मंदिरधन, समृद्धि और मंगल की देवी माँ लक्ष्मी कौन हैं, कमल-उल्लू जैसे प्रतीकों का अर्थ, अष्टलक्ष्मी, कथाएँ, त्योहार और प्रसिद्ध मंदिर।

व्रत-त्योहार में और

दीपावली 2026 — तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और पाँच दिन का पूरा कैलेंडर2026 में दीपावली 8 नवंबर (रविवार) को है। धनतेरस से भाई दूज तक पाँचों दिनों की तिथियाँ, लक्ष्मी पूजा का शुभ समय और हर दिन का महत्व।दीपावली लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि — सामग्री सूची और आसान स्टेप-बाय-स्टेप तरीकाघर पर दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा कैसे करें — पूरी सामग्री सूची, चौकी सजाने का तरीका और 12 आसान चरणों में पूजा विधि।अहोई अष्टमी 2026 (1 नवंबर) — व्रत कथा, पूजा विधि, तारों को अर्घ्य का समयअहोई अष्टमी रविवार 1 नवंबर 2026 को है। पूजा मुहूर्त शाम 5:36 से 6:54, तारे दिखने का समय शाम 6:00। पढ़िए पूरी व्रत कथा, सरल पूजा विधि और नियम।धनतेरस 2026 — 6 नवंबर: पूजा मुहूर्त, धन्वंतरि कथा, यम दीपदान और क्या ख़रीदेंधनतेरस 2026 शुक्रवार 6 नवंबर को है। पूजा का शुभ समय, भगवान धन्वंतरि और यम दीपदान की कथा, और इस दिन ख़रीदारी की परंपरा का असली अर्थ।

श्रुति घर में सब व्रत-त्योहार देखें →