अक्षय नवमी / आंवला नवमी 2026 (18 नवंबर) — कथा, आंवला पूजा विधि और महत्व
अक्षय नवमी (आंवला नवमी) बुधवार 18 नवंबर 2026 को है, पूजा का शुभ समय सुबह 6:46 से दोपहर 12:06 तक। पढ़िए माता लक्ष्मी की कथा, आंवले के पेड़ की पूजा विधि और महत्व।
इस लेख में
कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को अक्षय नवमी कहते हैं। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है, इसलिए इसे आंवला नवमी भी कहा जाता है। "अक्षय" का अर्थ है जो कभी क्षय न हो, यानी कभी कम न हो। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप, पूजा और सेवा का पुण्य अक्षय होता है, ठीक वैसे ही जैसे अक्षय तृतीया पर। यह पर्व देवउठनी एकादशी से दो दिन पहले आता है।
अक्षय नवमी 2026: तारीख़ और मुहूर्त (नई दिल्ली)
- तारीख़: बुधवार, 18 नवंबर 2026
- पूजा का शुभ समय (पूर्वाह्न): सुबह 6:46 से दोपहर 12:06 तक
- नवमी तिथि: 18 नवंबर सुबह 6:04 से 19 नवंबर सुबह 7:05 तक
(स्रोत: drikpanchang.com। आपके शहर का समय कुछ मिनट अलग हो सकता है।)
अक्षय नवमी का महत्व
- सतयुग का आरंभ: पौराणिक मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल नवमी से ही सतयुग का आरंभ हुआ था, इसलिए इसे "सत्य युगादि" भी कहते हैं।
- आंवले में भगवान का वास: मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है, और कार्तिक मास में उसकी पूजा विशेष फलदायी है।
- ब्रज में परिक्रमा: मथुरा-वृंदावन में इस दिन हज़ारों श्रद्धालु नगर की परिक्रमा करते हैं। कहा जाता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने वृंदावन छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान किया था।
- कूष्मांड नवमी: बंगाल और ओडिशा की कई परंपराओं में इसी दिन को कूष्मांड नवमी के रूप में मनाया जाता है और कद्दू (कूष्मांड) का दान किया जाता है।
आंवला नवमी की कथा
एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करने आईं। उनके मन में इच्छा हुई कि वे भगवान विष्णु और भगवान शिव, दोनों की पूजा एक साथ करें। पर यह कैसे हो? भगवान विष्णु को तुलसी प्रिय है और भगवान शिव को बेल।
माता लक्ष्मी ने सोचा कि ऐसा कौन-सा वृक्ष है जिसमें तुलसी और बेल, दोनों के गुण हों। उन्हें आंवले का ध्यान आया — आंवले में तुलसी जैसी पवित्रता भी है और बेल जैसे गुण भी। इसलिए उन्होंने आंवले के वृक्ष को ही विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की।
पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और भगवान शिव, दोनों वहाँ प्रकट हुए। माता लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष के नीचे ही भोजन बनाया और दोनों को प्रेम से भोजन कराया, फिर स्वयं प्रसाद ग्रहण किया। वह दिन कार्तिक शुक्ल नवमी था। तभी से इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करने और उसके नीचे बैठकर भोजन करने की परंपरा चली आ रही है।
कथा की सीख: सच्ची भक्ति रास्ता ढूँढ़ ही लेती है, और प्रकृति (पेड़-पौधे) में भी भगवान का वास है। आंवले की पूजा हमें पेड़ों का सम्मान करना सिखाती है।
आंवला नवमी पूजा विधि
- सुबह: स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और पूजा का संकल्प लें। पूजा पूर्वाह्न (सुबह 6:46 से दोपहर 12:06) में करना शुभ माना जाता है।
- आंवले का पेड़: आंवले के पेड़ के पास जाकर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठें। पेड़ के आसपास की जगह साफ़ कर लें।
- जल और दूध: पेड़ की जड़ में जल और थोड़ा कच्चा दूध चढ़ाएँ।
- पूजन: रोली, अक्षत (चावल), हल्दी, फूल और धूप से पेड़ की पूजा करें। घी का दीपक जलाएँ।
- कच्चा सूत: पेड़ के तने पर कच्चा सूत या कलावा लपेटते हुए 7 या 108 बार परिक्रमा करें।
- कथा और आरती: ऊपर दी गई कथा पढ़ें, फिर ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ) आरती करें।
- भोजन: संभव हो तो परिवार के साथ आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करें, या पेड़ के पास बना भोजन प्रसाद रूप में ग्रहण करें। भोजन में आंवला ज़रूर शामिल करें।
- दान: आंवला, अन्न, कपड़े या अपनी क्षमता अनुसार दान दें। इस दिन का दान अक्षय फल देने वाला माना जाता है।
अगर आपके आसपास आंवले का पेड़ नहीं है, तो घर में गमले में लगे आंवले के पौधे की पूजा करें, या भगवान विष्णु के सामने आंवला रखकर पूजा करें। श्रद्धा ही सबसे बड़ी पूजा है।
आंवला: सेहत का ख़ज़ाना
आयुर्वेद में आंवले को "अमृत फल" कहा गया है। इसमें विटामिन C भरपूर होता है, जो सर्दियों की शुरुआत में शरीर को मज़बूत रखता है। आंवले का मुरब्बा, चटनी या कच्चा आंवला — इस दिन से इसे अपने भोजन में शामिल करने की अच्छी शुरुआत कर सकते हैं।
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