🪔 व्रत-त्योहार

अहोई अष्टमी 2026 (1 नवंबर) — व्रत कथा, पूजा विधि, तारों को अर्घ्य का समय

अहोई अष्टमी रविवार 1 नवंबर 2026 को है। पूजा मुहूर्त शाम 5:36 से 6:54, तारे दिखने का समय शाम 6:00। पढ़िए पूरी व्रत कथा, सरल पूजा विधि और नियम।

अहोई अष्टमी 2026 (1 नवंबर) — व्रत कथा, पूजा विधि, तारों को अर्घ्य का समय
📖 ५ मिनट पढ़ें
इस लेख में
  1. अहोई अष्टमी 2026: तारीख़ और मुहूर्त (नई दिल्ली)
  2. अहोई अष्टमी व्रत कथा
  3. अहोई अष्टमी पूजा विधि
  4. ध्यान रखने योग्य बातें

करवा चौथ के बाद, कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। माताएँ यह व्रत अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख के लिए रखती हैं। दिन भर व्रत रखकर शाम को अहोई माता की पूजा होती है और तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। उत्तर भारत, ख़ासकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और मध्य प्रदेश में यह व्रत बड़ी श्रद्धा से रखा जाता है।

अहोई अष्टमी 2026: तारीख़ और मुहूर्त (नई दिल्ली)

  • तारीख़: रविवार, 1 नवंबर 2026
  • पूजा मुहूर्त: शाम 5:36 से 6:54 तक (लगभग 1 घंटा 18 मिनट)
  • तारे दिखने का समय (अर्घ्य): शाम लगभग 6:00 बजे
  • चंद्रोदय: रात 11:40 बजे (जो चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं, उनके लिए)
  • अष्टमी तिथि: 1 नवंबर दोपहर 2:51 से 2 नवंबर दोपहर 1:10 तक

(स्रोत: drikpanchang.com। तारे और चाँद निकलने का समय हर शहर में थोड़ा अलग होता है।)

इसी रात मथुरा के पास गोवर्धन में राधा कुंड स्नान भी होता है। मान्यता है कि अहोई अष्टमी की आधी रात को राधा कुंड में स्नान करने से संतान का आशीर्वाद मिलता है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा

बहुत समय पहले एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे और भरा-पूरा परिवार था। दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए साहूकार की पत्नी मिट्टी लाने जंगल गई। वह कुदाल से मिट्टी खोद रही थी कि अनजाने में कुदाल एक स्याहु (साही) की माँद पर जा लगी और उसका एक बच्चा मर गया।

यह देखकर उसका मन बहुत दुखी हुआ। वह पछताती हुई घर लौट आई, पर यह पाप उसके मन से नहीं गया। कुछ ही समय में एक-एक करके उसके सातों बेटे चल बसे। दुख से टूटी हुई साहूकारनी ने गाँव की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों को सारी बात बताई और रो पड़ी — "मैंने जान-बूझकर पाप नहीं किया, फिर भी मेरे बच्चे मुझसे छिन गए।"

बुज़ुर्ग स्त्रियों ने उसे समझाया: "तुमने अपना पाप सच्चे मन से मान लिया है, इससे आधा पाप तो वैसे ही कट गया। अब कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत रखो। दीवार पर स्याहु और उसके बच्चों का चित्र बनाकर उनकी पूजा करो और अपनी भूल की क्षमा माँगो। माता की कृपा से सब ठीक होगा।"

साहूकारनी ने वैसा ही किया। उसने पूरी श्रद्धा से व्रत रखा, स्याहु माता और उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजा की और हर साल यह व्रत करती रही। अहोई माता उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न हुईं और उसे फिर से सात पुत्रों का सुख मिला। तभी से माताएँ अपनी संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखती आ रही हैं।

कुछ परिवारों में यह कथा साहूकार की बेटी और उसकी सात भाभियों वाली कथा के रूप में सुनाई जाती है, जिसमें सबसे छोटी भाभी सुरही गाय की सेवा करके स्याहु माता को प्रसन्न करती है। दोनों कथाओं की सीख एक है — अनजाने में हुई भूल को भी मानकर सच्चे मन से प्रायश्चित्त करना।

कथा की सीख: किसी भी जीव को कष्ट न दें, और ग़लती हो जाए तो उसे छिपाने के बजाय स्वीकार करें। माँ की ममता हर जीव में एक-सी है, चाहे वह मनुष्य हो या स्याहु।

अहोई अष्टमी पूजा विधि

  1. सुबह: स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और संतान की मंगल-कामना के साथ व्रत का संकल्प लें। ज़्यादातर माताएँ तारे निकलने तक निर्जल व्रत रखती हैं; अपनी सेहत के अनुसार फलाहार भी कर सकती हैं।
  2. अहोई माता का चित्र: दीवार पर गेरू या लाल रंग से अहोई माता बनाएँ — आठ कोनों (अष्ट कोष्ठक) वाला चित्र, साथ में स्याहु और उसके सात बच्चे। आजकल बाज़ार में छपा हुआ अहोई माता का कैलेंडर भी मिलता है, उसे भी लगा सकते हैं।
  3. पूजा की तैयारी: चित्र के सामने चौकी पर जल से भरा कलश या करवा रखें (कई घरों में करवा चौथ वाला करवा ही रखा जाता है)। रोली, चावल, दूध, दीपक, फूल और भोग तैयार रखें। भोग में पुए, पूड़ी, हलवा, चने या मिठाई चढ़ाई जाती है।
  4. स्याहु माला: कई परिवारों में चाँदी की अहोई (स्याहु) और चाँदी के मोतियों की माला कलावे में पिरोकर पूजा में रखी जाती है और पूजा के बाद माँ उसे पहनती है। संतान के जन्म या विवाह पर इसमें एक मोती जोड़ने की परंपरा है।
  5. कथा: शाम के मुहूर्त में दीपक जलाकर, हाथ में गेहूँ के सात दाने लेकर अहोई माता की कथा सुनें या पढ़ें। फिर अहोई माता की आरती करें।
  6. तारों को अर्घ्य: तारे दिखने पर करवे या लोटे के जल से तारों को अर्घ्य दें और संतान के लिए प्रार्थना करें। इसके बाद व्रत खोलें।
  7. दान: पूजा का भोग और कुछ दक्षिणा घर की बड़ी स्त्री (सास या ननद) को देकर उनका आशीर्वाद लें।

करवे का जल फेंका नहीं जाता। कई घरों में इसे संभालकर रखा जाता है और दीपावली के दिन बच्चों के स्नान के जल में मिलाया जाता है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • इस दिन मिट्टी खोदने और नुकीली चीज़ों (सुई, कैंची) के काम से परहेज़ किया जाता है — कथा इसी से जुड़ी है।
  • व्रत बेटे और बेटी, दोनों संतानों के लिए रखा जाता है। आजकल पिता भी यह व्रत रखते हैं।
  • गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग महिलाएँ निर्जल व्रत की जगह फलाहार करें; श्रद्धा भाव से की गई पूजा ही सबसे बड़ी है।

अहोई अष्टमी के चार दिन बाद रमा एकादशी आती है और फिर दीपावली: रमा एकादशी 2026 (5 नवंबर) — व्रत कथा, पूजा विधि और पारण का समय, दीपावली 2026 — तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और पाँच दिन का पूरा कैलेंडर। पूजा का सामान्य तरीक़ा: घर पर रोज़ की सरल पूजा विधि — 10-15 मिनट में, क्रम से

यह भी पढ़ें

देवउठनी एकादशी 2026 (20 नवंबर) और कार्तिक की एकादशियाँ — व्रत विधि, पारण और तुलसी विवाहदेवउठनी एकादशी शुक्रवार 20 नवंबर 2026 को है और रमा एकादशी 5 नवंबर को। एकादशी व्रत क्या है, कैसे रखें, पारण कब करें और तुलसी विवाह का महत्व।दीपावली 2026 — तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और पाँच दिन का पूरा कैलेंडर2026 में दीपावली 8 नवंबर (रविवार) को है। धनतेरस से भाई दूज तक पाँचों दिनों की तिथियाँ, लक्ष्मी पूजा का शुभ समय और हर दिन का महत्व।घर पर रोज़ की सरल पूजा विधि — 10-15 मिनट में, क्रम सेघर के मंदिर में रोज़ की जाने वाली सरल पूजा — दीप, आचमन, गणेश स्मरण, पंचोपचार, आरती और क्षमा प्रार्थना, अर्थ के साथ।माँ दुर्गा और नवदुर्गा — नौ रूप, नवरात्रि के नौ दिन, कथा और मंदिरआदिशक्ति माँ दुर्गा का परिचय, सिंह और अस्त्रों का अर्थ, महिषासुर-वध की कथा, नवदुर्गा के नौ रूप दिन के क्रम से, त्योहार और प्रसिद्ध मंदिर।

व्रत-त्योहार में और

दीपावली लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि — सामग्री सूची और आसान स्टेप-बाय-स्टेप तरीकाघर पर दीपावली की लक्ष्मी-गणेश पूजा कैसे करें — पूरी सामग्री सूची, चौकी सजाने का तरीका और 12 आसान चरणों में पूजा विधि।धनतेरस 2026 — 6 नवंबर: पूजा मुहूर्त, धन्वंतरि कथा, यम दीपदान और क्या ख़रीदेंधनतेरस 2026 शुक्रवार 6 नवंबर को है। पूजा का शुभ समय, भगवान धन्वंतरि और यम दीपदान की कथा, और इस दिन ख़रीदारी की परंपरा का असली अर्थ।नरक चतुर्दशी और छोटी दीपावली 2026 — अभ्यंग स्नान, यम दीपक और कथा2026 में काली चौदस 7 नवंबर और नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान 8 नवंबर की सुबह है। जानिए इस दिन का महत्व, स्नान-विधि और नरकासुर की कथा।रमा एकादशी 2026 (5 नवंबर) — व्रत कथा, पूजा विधि और पारण का समयरमा एकादशी गुरुवार 5 नवंबर 2026 को है, पारण 6 नवंबर सुबह 6:37 से 8:48 तक। पढ़िए राजा मुचुकुंद, चंद्रभागा और शोभन की पूरी व्रत कथा और सरल पूजा विधि।

श्रुति घर में सब व्रत-त्योहार देखें →