देवउठनी एकादशी 2026 (20 नवंबर) और कार्तिक की एकादशियाँ — व्रत विधि, पारण और तुलसी विवाह
देवउठनी एकादशी शुक्रवार 20 नवंबर 2026 को है और रमा एकादशी 5 नवंबर को। एकादशी व्रत क्या है, कैसे रखें, पारण कब करें और तुलसी विवाह का महत्व।
इस लेख में
हिंदू पंचांग में हर महीने दो एकादशी आती हैं — शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि। एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है, और वर्ष की 24 एकादशियों में कार्तिक शुक्ल की देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी सबसे विशेष मानी जाती है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं।
2026 में कार्तिक की दोनों एकादशियाँ (नई दिल्ली)
रमा एकादशी — गुरुवार, 5 नवंबर 2026
दीपावली से ठीक पहले, कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी। तिथि 4 नवंबर सुबह 11:03 से 5 नवंबर सुबह 10:35 तक। पारण 6 नवंबर सुबह 6:37 से 8:48 के बीच।
देवउठनी / प्रबोधिनी एकादशी — शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
- एकादशी तिथि: 20 नवंबर सुबह 7:15 से 21 नवंबर सुबह 6:31 तक
- पारण (व्रत खोलने का समय): 21 नवंबर दोपहर 1:11 से 3:18 तक
- वैष्णव परंपरा (गौण एकादशी) मानने वाले 21 नवंबर को व्रत रखेंगे; उनका पारण 22 नवंबर सुबह 6:49 से 8:56 के बीच।
(स्रोत: drikpanchang.com। पारण का समय शहर के अनुसार बदलता है।)
देवउठनी एकादशी क्यों विशेष है?
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं — इन चार महीनों को चातुर्मास कहते हैं, जिसमें विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान जागते हैं, इसलिए इसे "देव-उठनी" या "प्रबोधिनी" कहते हैं। इसके बाद से विवाह और गृहप्रवेश जैसे शुभ कार्यों का मौसम शुरू होता है।
घरों में इस दिन आँगन में चौक पूरकर, गन्ने का मंडप बनाकर, थाली या सूप बजाते हुए भगवान को जगाया जाता है — "उठो देव, बैठो देव…" जैसे लोकगीत गाए जाते हैं।
तुलसी विवाह
2026 में तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर (द्वादशी) को है (कुछ परिवार एकादशी की शाम या कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन करते हैं)। इसमें तुलसी जी का विवाह भगवान शालिग्राम (विष्णु) से कराया जाता है। तुलसी के गमले को लाल चुनरी और श्रृंगार से सजाकर, गन्ने का मंडप बनाकर, विवाह की तरह फेरे कराए जाते हैं। इसके पीछे भाव है कि घर की हरियाली (तुलसी) और भगवान का मिलन घर में मंगल लाता है। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार दिन चुनें। पूरी विधि: तुलसी विवाह 2026 — 21 नवंबर: विधि, कथा और महत्व
एकादशी व्रत कैसे रखें — सरल विधि
- दशमी (एक दिन पहले): शाम को हल्का सात्विक भोजन करें; रात में भोजन न करें तो उत्तम।
- एकादशी सुबह: स्नान करके भगवान विष्णु के सामने दीप जलाएँ और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा: तुलसी दल, पीले फूल, फल और पंचामृत अर्पित करें। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें, विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ करें (गीता सुनें)। शाम को ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ) आरती करें।
- क्या खाएँ: अपनी क्षमता के अनुसार — निर्जल, केवल जल, फल-दूध, या एक बार फलाहार (कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना, आलू, शकरकंद, मूँगफली, सेंधा नमक)।
- क्या न खाएँ: चावल और अन्न (गेहूँ, दालें), प्याज़-लहसुन, सामान्य नमक।
- रात्रि जागरण: संभव हो तो भजन-कीर्तन करें।
- द्वादशी को पारण: पंचांग में दिए पारण समय में तुलसी दल डालकर जल या भोजन ग्रहण करें; पहले किसी ज़रूरतमंद को भोजन या दान दें।
एकादशी पर तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते — पूजा के लिए पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
ध्यान रखने योग्य बातें
- व्रत शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं, मन को संयमित करने के लिए है। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और बच्चे फलाहार या आंशिक व्रत रखें, या केवल पूजा-जप करें।
- एकादशी के दिन क्रोध, झूठ और निंदा से बचना भोजन के नियम से भी बड़ा नियम माना गया है।
आगे पढ़ें: भगवान विष्णु और दशावतार — दस अवतारों की सरल कथा, ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ), घर पर रोज़ की सरल पूजा विधि — 10-15 मिनट में, क्रम से