तुलसी विवाह 2026 — 21 नवंबर: विधि, कथा और महत्व
तुलसी विवाह 2026 शनिवार 21 नवंबर (कार्तिक शुक्ल द्वादशी) को है। घर पर तुलसी-शालिग्राम विवाह की आसान विधि, सामग्री, कथा और इसका अर्थ।
इस लेख में
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के बाद, घरों में सबसे प्यारा उत्सव होता है — तुलसी विवाह। आँगन की तुलसी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है और भगवान शालिग्राम (विष्णु का प्रतीक) से उनका विवाह कराया जाता है। इसके साथ ही विवाह और मांगलिक कार्यों का मौसम शुरू माना जाता है।
2026 में तिथि
- तुलसी विवाह (नई दिल्ली पंचांग): शनिवार, 21 नवंबर 2026 — कार्तिक शुक्ल द्वादशी
- द्वादशी तिथि: 21 नवंबर सुबह 6:31 से 22 नवंबर सुबह 4:56 तक
- कई परिवार यह विवाह देवउठनी एकादशी (20 नवंबर) की शाम को ही कर लेते हैं, और कुछ जगह कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर) तक किसी भी दिन — अपने घर की परंपरा मानें।
(स्रोत: drikpanchang.com)
तुलसी विवाह की कथा — संक्षेप में
पुराणों (मुख्यतः पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण) की कथा के अनुसार वृंदा नाम की एक परम पतिव्रता स्त्री थी, जिसका विवाह असुरराज जालंधर से हुआ था। वृंदा के सतीत्व के बल से जालंधर अजेय हो गया और देवताओं को सताने लगा। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने ऐसा उपाय किया जिससे वृंदा का व्रत भंग हुआ और जालंधर का अंत हो सका। सच जानकर वृंदा ने दुखी होकर विष्णु को पत्थर (शालिग्राम) बन जाने का श्राप दिया और स्वयं देह त्याग दी। जहाँ वृंदा ने देह त्यागी, वहाँ तुलसी का पौधा उगा।
भगवान विष्णु ने वृंदा की भक्ति का सम्मान करते हुए वरदान दिया कि तुलसी उन्हें सबसे प्रिय होगी, बिना तुलसी दल के उनकी पूजा अधूरी रहेगी, और हर वर्ष शालिग्राम रूप में उनका तुलसी से विवाह होगा। इस कथा के अलग-अलग रूप अलग पुराणों में मिलते हैं।
सामग्री
- तुलसी का गमला (साफ़ करके गेरू या रंगोली से सजाया हुआ)
- शालिग्राम जी, या भगवान विष्णु/कृष्ण की छोटी मूर्ति या चित्र
- गन्ने (मंडप के लिए 4), लाल चुनरी, श्रृंगार की वस्तुएँ (बिंदी, चूड़ी, सिंदूर, मेहंदी)
- हल्दी, रोली, अक्षत, फूलमाला, दीपक, धूप
- मौसमी फल — सिंघाड़ा, बेर, आँवला, शकरकंद — और मिठाई
घर पर तुलसी विवाह की विधि
- शाम को तुलसी के गमले के चारों ओर गन्नों से मंडप बनाएँ और ऊपर चुनरी या आम के पत्तों की बंदनवार बाँधें।
- तुलसी जी को लाल चुनरी ओढ़ाएँ और श्रृंगार अर्पित करें।
- शालिग्राम जी (या विष्णु जी) को तुलसी के दाहिनी ओर एक चौकी पर विराजमान करें, स्नान कराकर चंदन-फूल अर्पित करें।
- दोनों को हल्दी लगाएँ, दीप जलाएँ, धूप दिखाएँ।
- घर के कोई सदस्य शालिग्राम जी को हाथ में लेकर तुलसी जी की सात परिक्रमा करें — यही "फेरे" हैं। परिवार मंगल गीत गाए।
- अंत में ओम जय जगदीश हरे — आरती (पूरे बोल और अर्थ) आरती करें, फल-मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद बाँटें।
कई परिवार इस दिन कन्यादान की तरह तुलसी का "दान" भी करते हैं — यह भाव है कि घर की बेटी (तुलसी) को भगवान को सौंपा जा रहा है।
इस पर्व का अर्थ
तुलसी आयुर्वेद में भी गुणकारी पौधा है, और हर हिंदू आँगन की पहचान। तुलसी विवाह हमें याद दिलाता है कि प्रकृति और ईश्वर अलग नहीं — घर की हरियाली की सेवा भी पूजा है। साथ ही वृंदा की कथा बताती है कि सच्ची भक्ति और निष्ठा का सम्मान स्वयं भगवान भी करते हैं।
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