तिलक और कलावा (मौली) — क्यों लगाते हैं, कैसे और इनका अर्थ
माथे पर चंदन, कुमकुम या भस्म का तिलक और हाथ में कलावा क्यों बाँधते हैं, कैसे लगाते-बाँधते हैं और इनके पीछे का सुंदर भाव।
इस लेख में
पूजा शुरू होते ही पंडित जी या घर के बड़े सबसे पहले दो काम करते हैं: माथे पर तिलक लगाते हैं और कलाई पर लाल-पीला धागा, यानी कलावा बाँधते हैं। बच्चे अक्सर पूछते हैं: "यह क्यों?" यह पेज उसी सवाल का सीधा, सरल जवाब है।
छोटी बात यह है: तिलक और कलावा याद दिलाने वाले चिह्न हैं। तिलक हमें याद दिलाता है कि हमारा मन और विचार ईश्वर को समर्पित हैं; कलावा याद दिलाता है कि हमने अभी एक शुभ संकल्प लिया है और भगवान का आशीर्वाद हमारे साथ है।
तिलक क्या है?
तिलक माथे पर, दोनों भौंहों के बीच या उसके ऊपर लगाया जाने वाला चिह्न है। योग परंपरा में भौंहों के बीच के स्थान को आज्ञा चक्र कहा गया है, यानी ध्यान, विवेक और एकाग्रता का केंद्र। तिलक उसी स्थान को सम्मान देने और मन को वहाँ टिकाने का प्रतीक है।
पूजा, त्योहार, विवाह, यात्रा पर निकलना, परीक्षा, नया काम, किसी अतिथि का स्वागत, ऐसे हर शुभ मौके पर तिलक लगाया जाता है। भाई दूज और रक्षाबंधन पर बहन भाई को तिलक लगाती है, जो प्रेम और मंगलकामना का सबसे प्यारा रूप है।
तिलक के प्रकार और उनका भाव
चंदन का तिलक
चंदन ठंडक और सुगंध देता है। इसलिए इसे शांत मन और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। वैष्णव परंपरा (भगवान विष्णु, राम, कृष्ण के भक्त) में अक्सर माथे पर खड़ी रेखाओं वाला ऊर्ध्व पुंड्र तिलक लगाया जाता है, जो ऊपर, यानी ईश्वर की ओर उठने का भाव दिखाता है।
कुमकुम / रोली का तिलक
हल्दी और चूने से बना लाल कुमकुम शक्ति, उत्साह और मंगल का रंग है। देवी उपासना (शाक्त परंपरा) में और लगभग हर पूजा में रोली का तिलक लगता है, अक्सर उस पर कुछ अक्षत (साबुत चावल) भी लगाए जाते हैं, जो पूर्णता और समृद्धि का प्रतीक हैं।
भस्म / विभूति का तिलक
शैव परंपरा में माथे पर भस्म की तीन आड़ी रेखाएँ लगाई जाती हैं, जिसे त्रिपुंड कहते हैं। भस्म याद दिलाती है कि यह शरीर एक दिन राख होगा, इसलिए अहंकार छोड़कर अच्छे कर्म करें। भगवान शिव स्वयं भस्म धारण करते हैं।
अलग-अलग संप्रदायों के तिलक के आकार अलग हैं, पर किसी को ऊँचा-नीचा मानने की बात नहीं। हर तिलक का संदेश एक ही है: "मैं ईश्वर का हूँ।"
तिलक कैसे लगाएँ
- स्नान के बाद, पूजा शुरू करने से पहले तिलक लगाएँ।
- चंदन या रोली को थोड़े जल से घोल लें। भस्म सूखी या हल्की गीली लगाई जाती है।
- परंपरा में अपने आप को तिलक अनामिका (छोटी उंगली के पास वाली) उंगली से लगाने का चलन है, और भगवान या दूसरों को अंगूठे से भी लगाया जाता है। घर की जो परंपरा हो, वही ठीक है।
- भौंहों के बीच से ऊपर की ओर हल्के हाथ से लगाएँ। मन में अपने इष्ट देव का नाम लें, जैसे "ॐ नमः शिवाय" या "श्री राम"।
- पहले भगवान को तिलक लगाएँ, फिर स्वयं को और परिवार को।
कलावा या मौली क्या है?
कलावा कच्चे सूत (कपास) का लाल-पीला धागा है। इसे मौली और रक्षा सूत्र भी कहते हैं। पूजा, हवन, सत्यनारायण कथा या किसी संस्कार के समय संकल्प लेते हुए पंडित जी इसे कलाई पर बाँधते हैं।
इसका भाव है: "मैंने यह शुभ कार्य भगवान को साक्षी मानकर शुरू किया है, और मैं अपने वचन से बँधा हूँ।" साथ ही बाँधने वाला आपके लिए रक्षा और मंगल की प्रार्थना करता है। लाल रंग शक्ति और मंगल का, पीला रंग ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
कलावा बाँधते समय का मंत्र
परंपरा में रक्षा सूत्र बाँधते समय यह श्लोक बोला जाता है:
सरल अर्थ: जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवराज बलि को (वचन में) बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षा सूत्र, तुम अडिग रहना, विचलित मत होना।
राजा बलि की कथा याद दिलाती है कि बलि ने अपना वचन हर हाल में निभाया था। इसलिए कलावा वचन, संकल्प और रक्षा, तीनों का प्रतीक बन गया।
कलावा कैसे बाँधें
- परंपरा में पुरुषों और अविवाहित लड़कियों के दाएँ हाथ में, और विवाहित स्त्रियों के बाएँ हाथ में कलावा बाँधने का चलन है। कई परिवारों में सबके दाएँ हाथ में बाँधते हैं; घर की रीति ही मानें।
- जिस हाथ में बाँध रहे हों, उसकी मुट्ठी हल्की बंद रखें और दूसरा हाथ सिर पर रखें, यह आदर का भाव है।
- कलावे को कलाई पर तीन (या पाँच) बार लपेटकर गाँठ लगाई जाती है। ज़्यादा कसकर न बाँधें।
- बाँधते समय ऊपर वाला श्लोक या केवल भगवान का नाम लें।
पुराना कलावा कब और कैसे उतारें?
कलावा अपने आप ढीला हो जाए, गंदा हो जाए या कुछ दिन बाद, जब मन हो, आदर से उतार सकते हैं। उसे कूड़े में फेंकने के बजाय किसी पेड़ (जैसे पीपल) की जड़ के पास मिट्टी में रख दें या बहते जल में विसर्जित कर दें, क्योंकि वह पूजा का धागा था।
ध्यान रखने योग्य बातें
- तिलक और कलावा भाव के चिह्न हैं, ताबीज़ नहीं। अच्छाई की रक्षा हमारा अपना आचरण करता है; धागा उस आचरण की याद दिलाता है।
- कलावा न बँधा हो या तिलक न लगा हो, तो कोई अपशकुन नहीं होता। जो कर सकें, श्रद्धा से करें।
- स्कूल, दफ़्तर या खेल में अगर नियम हो तो छोटा तिलक या मन में किया गया प्रणाम भी उतना ही सच्चा है।
- त्वचा संवेदनशील हो तो शुद्ध चंदन या घर की हल्दी-रोली ही लगाएँ; केमिकल वाले रंगों से बचें।
बच्चों के लिए एक लाइन में
तिलक कहता है: "मेरे विचार अच्छे रहें।" कलावा कहता है: "मैंने जो अच्छा वादा किया है, उसे निभाऊँगा, और भगवान मेरे साथ हैं।"
पूजा की पूरी आसान विधि के लिए पढ़ें घर पर रोज़ की सरल पूजा विधि — 10-15 मिनट में, क्रम से, और जीवन के संस्कारों के बारे में सोलह संस्कार — जन्म से पहले से जीवन के अंत तक।
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